100 रुपये की चोरी में पकड़ा, थर्ड डिग्री देकर ले ली थी जान; 29 साल बाद दरोगा को मिली ऐसी सजा
वाराणसी में 29 साल पुराने कस्टोडियल डेथ मामले में अदालत ने दो दरोगा और एक डॉक्टर को सजा सुनाई है. 100 रुपये की चोरी के शक में युवक की हिरासत में थर्ड डिग्री टॉर्चर से मौत हो गई थी, जिसे पुलिस और डॉक्टर ने मिलकर आत्महत्या दिखाने की कोशिश की. CBCID जांच से सच सामने आया और लंबे संघर्ष के बाद आखिरकार न्याय मिला, दोषियों को जेल भेजा गया.
उत्तर प्रदेश के वाराणसी में 29 साल पहले हुए एक कस्टोडियल डेथ के मामले में अदालत ने दो दरोगा और एक डॉक्टर को कठोर कारावास की सजा सुनाई है. इस मामले में आरोपी दरोगा ने महज 100 रुपये की चोरी के शक में एक युवक को थाने लाकर थर्ड डिग्री टॉर्चर किया था. इस दौरान युवक की मौत हो गई. पुलिस ने मामले की लीपापोती करते हुए शव का पोस्टमार्टम कराया. इसमें डॉक्टर ने पुलिस के पक्ष में रिपोर्ट बनाई. हालांकि बाद में मामला कोर्ट पहुंचा तो पुलिस और डॉक्टर की करतूत का खुलासा हो गया.
इस मामले में अदालत ने बनारस में लंका थाना क्षेत्र के सुंदरपुर पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी (इंचार्ज) दरोगा को 10 साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई है. वहीं अपनी ड्यूटी में लापरवाही के आरोप में थाने के तत्कालीन एसएसआई को छह महीने की सजा सुनाई है. इसी प्रकार पुलिस के गुनाह पर लीपापोती के आरोप में पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टरों को पांच साल की सजा सुनाई है. कोर्ट के आदेश पर इन तीनों को हिरासत में लेकर जेल भेज दिया गया है.
क्या है मामला?
केस डायरी के मुताबिक साल 1997 में सुंदरपुर पुलिस चौकी में 100 रुपये की शिकायत आई थी. इसमें एक युवक पर शक जाहिर किया गया था. इस शिकायत पर चौकी के दरोगा ने आरोपी युवक को हिरासत में लिया और जमकर टॉर्चर किया. आरोप है कि उसे लाठी डंडों से बुरी तरह पीटा गया. इस पिटाई के दौरान ही आरोपी युवक ने दम तोड़ दिया था. इसके बाद पुलिस ने अपनी खाल बचाने के लिए पोस्टमार्टम की नौटंकी की और डॉक्टर से मिलकर फर्जी रिपोर्ट बनवा दिया था. यही नहीं, रात के अंधेरे में चुपचाप अंतिम संस्कार कराने की भी कोशिश की.
ऐसे खुला राज
पीड़ित परिवार ने इस घटना को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था. मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी. बाद में यह मामला सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंप दिया गया. एजेंसी ने जांच की तो कस्टडी में थर्ड डिग्री टॉर्चर की पुष्टि हो गई. इसके बाद जांच आगे बढ़ी तो पता चला कि पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने पुलिस के कहने पर मनमाना रिपोर्ट बनाया था. इस डॉक्टर ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट में इस हत्याकांड को सुसाइड करार देने की कोशिश की थी.
कुल 11 लोगों पर दर्ज हुआ था केस
29 साल तक चले इस मुकदमे में कुल 11 आरोपी बनाए गए थे. हालांकि सुनवाई के दौरान ही 4 आरोपियों की मौत हो गई. बाकी 7 आरोपियों में से 3 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में बरी कर दिया गया. इनमें तत्कालीन अपर नगर मजिस्ट्रेट और दो सिपाही शामिल हैं. बाकी बचे आरोपियों के खिलाफ अदालत में सुनवाई हुइ. इनके खिलाफ सीबीसीआईडी ने मजबूत पैरवी की. इसके दम पर इन्हें अब सजा हो सकी है.
