दालमंडी प्रोजेक्ट: अंग्रेजों के समय बने मुसाफिर खाने का एक हिस्सा ध्वस्त; लोगों ने क्या कहा?
वाराणसी में दालमंडी परियोजना के तहत अंग्रेजों के समय बने ऐतिहासिक मुसाफिर खाने का एक हिस्सा ध्वस्त किया गया. पैरा मिलिट्री फ़ोर्स और कई थानों की पुलिस की मौजूदगी में ये कार्रवाई शुरू हुई. वहीं, स्थानीय लोग इसके टूटने पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं, जिससे विरोध भी सामने आया है.
वाराणसी की दालमंडी चौड़ीकरण परियोजना के तहत ध्वस्तीकरण की कार्रवाई जारी है. इसी क्रम में सोमवार को अंग्रेजों के समय बने ऐतिहासिक मुसाफिर खाने का एक हिस्सा ध्वस्त किया गया. 1920 के दशक में इसे बहुत कम पैसे में लोगों के रुकने की सहूलियत के लिए बनाया गया था. पिछले चालीस साल से वक्फ बोर्ड मुसाफिर खाने का संचालन कर रहा है.
पैरा मिलिट्री फ़ोर्स और कई थानों की पुलिस की मौजूदगी में मुसाफिर खाने के एक हिस्से पर हथौड़ा चला. जिस हिस्से को तोड़ा गया, उसमें मैरेज हॉल संचालित होता था. पीडब्लूडी के एक्सईएन केके सिंह ने बताया कि 12 दिन पहले मुसाफिरखाने के इस हिस्से की(21 फुट )रजिस्ट्री हो चुकी है. वहीं, मुसाफिर खाने के मैरिज हॉल टूटने पर स्थानिय लोगों में नाराजगी है.
जितना हिस्सा चाहिए था, उतने पर ही कार्रवाई- ACP
एसीपी दशास्वमेध अतुल अंजान त्रिपाठी ने बताया कि चौड़ीकरण के लिए जितना हिस्सा चाहिए था, उतने हिस्से पर ही कार्रवाई हो रही है. दालमंडी में बीते शनिवार को 45 भवनों पर ध्वस्तीकरण की कार्रवाई शुरू हुई थी. मुसाफिर खाने के इस हिस्से पर कार्रवाई भी उसी का हिस्सा है. तीन जेसीबी और 60 मजदूरों को इस ध्वस्तीकरण अभियान में लगाया गया है.
वीडीए और पीडब्लूडी के संयुक्त अभियान में जिन 45 भवनों पर कार्रवाई हो रही है, उनमें से 25 भवनों की रजिस्ट्री हो चुकी है जबकि 20 जर्जर घोषित किए गए हैं. अब तक 39 करोड़ रूपये मुआवजे में बांट दिया गया है. 220 करोड़ के इस प्रोजेक्ट में 191 करोड़ मुआवजे में दिए जाने है. दालमंडी में जमीन खाली कराने की डेडलाइन 31 मई तय की गई है.
मुसाफिर खाने पर दालमंडी के लोगों ने क्या कहा?
दालमंडी में कारोबार करने वाले शकील अहमद बताते हैं कि मुसाफिर खाना ऐसे लोगों के लिए रुकने का इंतज़ाम करता है, जो होटल या महंगे लॉज में रुकने में असमर्थ हैं. यहां के सौ कमरे और पचास आलमारी यानी कि कुल डेढ़ सौ लोगों के रुकने की व्यवस्था मुसाफिरखाने में है. कमरे का किराया करीब डेढ़ सौ और पचास रूपये में आलमारी मिल जाती है.
हालांकि यहां 99% मुस्लिम ही रुकते हैं लेकिन धर्म यहां कोई बाध्यता नहीं है. मैरिज हॉल जिसपर हथौड़ा चला है ये कम पैसे में लोगों को शादी-ब्याह के लिए जगह उपलब्ध कराता था. इसके टूटने पर अफ़सोस तो है. आगा कमाल बताते हैं कि मुगलों के समय पहले ये एक सराय के रूप में था. जो नॉमिनल पैसे में परदेसी लोगों के रुकने के लिए बनाया गया था.
दालमंडी के ही आमिर हफ़ीज जो कि एक वकील भी हैं वो इस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हैं. आमिर हफीज कहते हैं कि वक़्फ सम्पत्ति के किसी भी हिस्से पर चाहे वो मैरिज हॉल हो या फिर मस्जिद अगर आप कार्रवाई कर रहे हैं तो प्रॉपर अधिग्रहण की कार्रवाई के बाद ही ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हो सकती है. वक्फ प्रॉपर्टी से होने वाली कमाई यतीमों /गरीबों के लिए है.
