ज्ञानवापी विवाद में नहीं निकला समाधान, सुलह वार्ता विफल; अब अदालत से ही उम्मीद
ज्ञानवापी विवाद पर सुलह वार्ता बेनतीजा रही. वाराणसी में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण में हुई बैठक में दोनों पक्ष किसी समझौते पर नहीं पहुंच सके. वादी और प्रतिवादी दोनों ने स्पष्ट किया कि इस जटिल मामले का अंतिम समाधान केवल अदालत के निर्णय से ही संभव है. इस दौरान प्रशासन पूरी तरह सतर्क रहा.
ज्ञानवापी विवाद को आपसी सहमति से सुलझाने की सुप्रीम कोर्ट की पहल फिलहाल सफल नहीं हो सकी. सोमवार को जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, वाराणसी में दोनों पक्षों के बीच आयोजित सुलह वार्ता किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंच सकी. बैठक के बाद वादी और प्रतिवादी दोनों पक्षों ने कहा कि विवाद का अंतिम समाधान केवल अदालत के फैसले से ही संभव है.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर आयोजित इस बैठक में हिंदू और मुस्लिम पक्ष के अधिवक्ताओं के साथ संबंधित पक्षकार भी मौजूद रहे. दोनों पक्षों के बीच विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा हुई, लेकिन किसी मुद्दे पर सहमति नहीं बन सकी. इसके चलते वार्ता बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई. बैठक के दौरान परिसर और आसपास सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए गए थे.
‘मंदिर छोड़कर जो समझौता करेंगे, हमें मंजूर’
वादी पक्ष के अधिवक्ता सुभाष नंदन चतुर्वेदी ने कहा कि उन्हें न्यायपालिका पर पूरा भरोसा है. उन्होंने कहा कि अदालत साक्ष्यों और कानूनी तथ्यों के आधार पर जो भी फैसला सुनाएगी, वह सभी को स्वीकार होगा. वहीं, वादी पक्ष के अधिवक्ता सुधीर त्रिपाठी ने भी न्यायिक प्रक्रिया पर विश्वास जताया और साफ कहा कि हमें मंदिर के संदर्भ में कोई वार्ता नहीं करनी है.
उनका कहना है कि, ‘मंदिर और मंदिर परिसर छोड़कर जो समझौता करेंगे, शर्त रखेंगे वो मानने के लिए तैयार हैं. वो मंदिर हमारा है और हमारा रहेगा. इसलिए सुलह-समझौते नहीं करनी है.’ वहीं, प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता रईस अहमद ने कहा कि यह विवाद अब अदालत के निर्णय से ही सुलझेगा.
हम अदालत में अपना पक्ष रखते रहेंगे- रईस
अधिवक्ता रईस अहमद ने कहा कि बैठक में कोई समाधान नहीं निकल सका. यह विवाद अब अदालत के निर्णय से ही सुलझेगा. मुस्लिम पक्ष न्यायालय में कानूनी प्रक्रिया के तहत अपना पक्ष रखता रहेगा. प्रतिवादी पक्ष के अधिवक्ता तौफीक अहमद ने भी यही रुख दोहराया. अब इस बहुचर्चित मामले में सभी की नजरें सुप्रीम कोर्य ही पर टिकी हैं.
हिंदू पक्ष के मुताबिक ,इस स्थान पर मस्जिद का निर्माण मंदिर के ढांचे पर हुआ है. तीन महीने तक चले एएसआई के सर्वे में यहां मंदिर के अवशेष मिले हैं. यह पहले एक प्राचीन और मूल काशी विश्वनाथ मंदिर था. जबकि मुस्लिम पक्ष इसे वक्फ बोर्ड की भूमी बता रहा है, जहां सदियों से नमाज पढ़ी जा रही थी. इसलिए इसे छोड़ने का सवाल ही नहीं है.