‘शादी से महिला की जाति नहीं बदलती, भले ही वह धर्म ही क्यों ना बदल ले’, इलाहाबाद HC का फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एससी-एसटी एक्ट से संबंधित एक आपराधिक अपील पर की है. एक महिला ने कई लोगों पर हमला और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया था. इसी को लेकर आरोपियों ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसे खारिज कर दिया गया.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक निर्णय में कहा कि जन्म से एक व्यक्ति की जाति वही रहती है, भले ही वह व्यक्ति अपना धर्म ही क्यों न बदल ले और एक महिला के विवाह से उसकी जाति नहीं बदलती. अदालत ने एससी-एसटी अधिनियम से संबंधित एक आपराधिक अपील खारिज करते हुए यह टिप्पणी की.
हाईकोर्ट के जस्टिस अनिल कुमार ने दिनेश और आठ अन्य लोगों द्वारा दायर आपराधिक अपील इस टिप्पणी के साथ खारिज कर दी. अलीगढ़ के विशेष न्यायाधीश (SC/ST) ने आरोपियों को तत्कालीन भारतीय दंड संहिता (IPS ) और अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति अधिनियम के तहत अपराधों के लिए समन जारी किया था, जिसे आरोपियों ने चुनौती दी थी.
महिला की जाट समुदाय में शादी हुई थी
जानकारी के मुताबिक, एक महिला ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि इन सभी लोगों ने उस पर हमला किया और झगड़े के दौरान जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया. इस घटना में महिला और दो अन्य लोग घायल हुए थे. इसके बाद मामले में 9 नामजद लोगों समेत अन्य को समन जारी किया था, जिसके बाद सभी आरोपी हाईकोर्ट पहुंचे थे.
अपीलकर्ताओं ने अदालत में दलील दी थी कि शिकायतकर्ता जन्म से अनुसूचित जाति समुदाय से ताल्लुक रखती है और मूलरूप से पश्चिम बंगाल की निवासी है. कहना था कि महिला के जाट समुदाय के एक व्यक्ति के साथ विवाह के बाद उसकी जाति बदल गई है, इसलिए एससी-एसटी अधिनियम के तहत अपराध के लिए समन जारी करना निराधार है.
‘धर्म बदल सकता है, लेकिन जाती नहीं’
यह मामला 2022 में अलीगढ़ के खैर थाने में दर्ज किया गया था. FIR में SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(R) के तहत केस दर्ज हुआ था. वहीं, हाईकोर्ट ने 10 फरवरी अपील खारिज करते कहा, ‘एक व्यक्ति अपना धर्म बदल सकता है, धर्मांतरण के बाद भी उसकी जाति वहीं रहती है. इसलिए विवाह से एक व्यक्ति की जाति नहीं बदलती. ये दलील टिकने योग्य नहीं है.’
