आरक्षण या कुछ और… UP में पंचायत चुनाव को लेकर क्यों दुविधा में सरकार? ये हैं बड़े कारण
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के टलने के आसार हैं. यह स्थिति ओबीसी आरक्षण में पेच की वजह से बनी है. माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के 'ट्रिपल टेस्ट' मानकों के चलते समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन और सर्वे में कई महीने लगेंगे. ऐसी स्थिति में बिना आयोग की रिपोर्ट के ओबीसी सीटों का निर्धारण संभव नहीं. आइए, समझते हैं कि चुनावों में क्यों अड़चन आ रही है.
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर दुविधा की स्थिति बन गई है. अब तक ये चुनाव अप्रैल-मई में ही होने थे, लेकिन इस समय हालात ऐसे बन गए हैं कि इन तीन चार महीनों में चुनाव की तैयारियां हो ही नहीं सकती. ऐसे में बहुत संभव है कि ये चुनाव कम से कम चार महीने और टल जाएं. चूंकि सभी राजनीतिक दल इन चुनावों में परोक्ष या अपरोक्ष तरीके से उतरने की प्लानिंग कर ली है.
कई राजनीतिक दलों ने तो अपनी प्लानिंग के आधार पर जमीन पर काम भी शुरू कर दिया है. ऐसे में इन संभावनाओं को देखते हुए माहौल गरमाने लगा है. ऐसे में यह जान लेना जरूरी है कि ऐसी स्थिति क्यों बनी. आइए, बिंदुवार इस संभावना को समझने की कोशिश करते हैं.
- अभी तक इन चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण नहीं हो सका है. दरअसल, आरक्षण तय करने के लिए अभी तक समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन नहीं हो सका है. आयोग गठित होने के बाद ही आबादी में ओबीसी की भागीदारी तय करते हुए उनके लिए सीटों का आरक्षण होगा. इसके बाद ही चुनाव कराए जा सकते हैं.
- सुप्रीम कोर्ट ने पहले ट्रिपल टेस्ट मानक तय कर रखे हैं. इन मानकों के चलते बिना आयोग की रिपोर्ट के ओबीसी आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता. चूंकि अभी आयोग ही गठित नहीं है, इसलिए पहले आयोग का गठन करना होगा. इसके बाद ही चुनाव की कवायद शुरू हो सकेगी.
- समर्पित पिछड़ा आयोग के गठन के लिए पंचायती राज विभाग की ओर से छह सदस्यों के नाम प्रस्ताव बनाकर पहले ही शासन को भेजा जा चुका है. इस प्रस्ताव पर कैबिनेट की बैठक में चर्चा होनी है. इसके बाद ही आयोग का गठन हो सकता है.
- यदि सरकार अब आयोग का गठन कर भी देती है तो सभी 75 जिलों में ओबीसी आबादी का सर्वे कराने में कम से कम छह महीने का समय लग सकते हैं. इसके बाद सीटें निर्धारित करने और चुनाव कराने में भी तीन से चार महीने का समय लगेगा. ऐसी स्थिति में चुनाव कम से कम आज से छह से सात महीने बाद ही संभव है.
इसलिए हुई दुविधा
उत्तर प्रदेश सरकार में पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने हाल ही में बयान दिया है कि चुनाव समय पर होंगे. उन्होंने यहां तक कहा कि चुनाव अप्रैल-मई में ही होंगे. उनका यह बयान दुविधा क्रिएट करने वाला है. सवाल यह है कि इतने कम समय में सरकार आरक्षण की प्रक्रिया कैसे पूरा करेगी. दरअसल 2011 की जनगणना के आधार पर इस पंचायत चुनाव में अनुसूचित जाति (एससी) के लिए 20.70% सीटें तय हैं. इसी प्रकार अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए भी 0.57% सीटें आरक्षित होंगी. दिक्कत ओबीसी के लिए है. क्यों कि उस समय जनगणना में ओबीसी की संख्या नहीं आई थी.
रैपिड सर्वे में आया ये आंकड़ा
2015 के रैपिड सर्वे हुआ था. इसमें ग्रामीण आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 53.33% पायी गई थी. 2021 के पंचायत चुनावों में इसी रैपिड सर्वे के आधार पर आरक्षण भी दिया गया, लेकिन अब अधिकतम 27% आरक्षण सीमा लागू है. ऐसे में यदि किसी ब्लॉक में ओबीसी आबादी 27% से अधिक हो तो वहां ग्राम प्रधानों के पदों पर 27% से अधिक आरक्षण नहीं दिया जा सकता. ये तो सरकार का मामला है, लेकिन दूसरी तरफ राज्य निर्वाचन विभाग अपने स्तर पर चुनाव की तैयारी में जुट गया है. इसी क्रम में मतदाता सूची संशोधन का काम तेज कर दिया है.
