हेलंग-कल्पेश्वर में आ सकती है जोशीमठ जैसी तबाही! दरक रहे दोनों पहाड़, रिपोर्ट ने बढ़ाई चिंता
उत्तराखंड के हेलंग और कल्पेश्वर में जोशीमठ जैसी तबाही का खतरा मंडरा रहा है. वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार, ये पहाड़ियां भी धीरे-धीरे दरक रही हैं. हेलंग में 40 सेमी और कल्पेश्वर में 20 सेमी भूधंसाव दर्ज किया गया है. नदियों के कटाव और भारी बारिश को इसका मुख्य कारण बताया गया है. समय रहते समाधान न हुआ तो स्थिति गंभीर हो सकती है, जिससे बड़े भूस्खलन और जानमाल का नुकसान संभव है.
उत्तराखंड के सीमांत नगर जोशीमठ की तरह की तबाही की स्थिति अब हेलंग और कल्पेश्वर में आ सकती है. ये पहाड़ियां भी धीरे-धीरे दरक रही हैं. वैज्ञानिकों ने सर्वे के बाद एक रिपोर्ट जारी की है. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अभी सचेत नहीं हुए तो इन पहाड़ियों पर भी जोशीमठ जैसी तबाही आ सकती है. बता दें कि जनवरी 2023 में भूधंसाव की आपदा ने जोशीमठ को हिलाकर रख दिया था.
सैकड़ों मकानों में दरारें आईं, जमीन फटी और बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए. इसके बाद नगर के ट्रीटमेंट के लिए केंद्र सरकार की ओर से करीब 1600 करोड़ रुपये का पैकेज जारी किया गया. उसके बाद से अब तक यहां उपचार एवं स्थिरीकरण का काम चल रहा है. जोशीमठ से पहले गोपेश्वर में भी भूधंसाव की समस्या सामने आ चुकी है. वहां उपचार कार्य किए जाने के बावजूद कुछ घरों में आज भी दरारें आने की शिकायतें सामने आती रही हैं.
हेलंग में 40 सेंटीमीटर धंसा पहाड़
अब वैज्ञानिकों ने एक और संवेदनशील क्षेत्र के प्रति सरकार को आगाह किया है. बताया है कि हेलंग में 40 सेंटीमीटर तक धंसाव हो चुका है. राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT) राउरकेला के वैज्ञानिकों प्रो. हेलिका दलाल और प्रो. भास्कर कुंडू के अध्ययन में हेलंग और कल्पेश्वर क्षेत्र में जमीन की धीमी गति से हो रही हलचल को लेकर गंभीर संकेत मिले हैं. यह शोध 22 जुलाई 2026 को Frontiers in Earth Science जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
कल्पेश्वर में 20 सेंटीमीटर धंसाव
अध्ययन में वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत द्वारा उपलब्ध कराए गए GPS टाइम-सीरीज डेटा का भी इस्तेमाल किया गया है. वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 से 2023 के बीच यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Sentinel-1 उपग्रह से प्राप्त 314 रडार इमेज का विश्लेषण किया. InSAR तकनीक के जरिए जमीन में मिलीमीटर से सेंटीमीटर स्तर तक होने वाले बदलावों को मापा गया. इसमें पाया गया कि कल्पेश्वर में 20 सेंटीमीटर तक धंसाव हुआ है. इसकी दिशा कल्पगंगा घाटी की ओर है.
क्यों धंस रही पहाड़ियां?
वैज्ञानिकों के अनुसार नदियों द्वारा पहाड़ों के निचले हिस्से का लगातार कटाव, भारी बारिश और पहाड़ों के भीतर पानी का जमा होने की वजह से यह स्थिति बनी है. सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हर पहाड़ अचानक नहीं टूटता, कई बार पहाड़ियां सालों तक बेहद धीमी गति से खिसकती और धंसती रहती हैं. जमीन की यही धीमी हलचल आगे चलकर बड़े भूस्खलन या भूधंसाव का रूप लेती हैं.
रिपोर्ट: पूरन भिलंगवाल, चमोली
