आजमगढ़ पहुंचा 2 युवकों का कंकाल, गार्ड बनने 2 साल पहले रूस गए थे, युद्ध में धकेल दिए गए
आजमगढ़ और मऊ के कई युवकों को गार्ड की नौकरी के बहाने रूस ले जाया गया था. फिर उन्हें यूक्रेन के साथ चल रहे युद्ध में धकेल दिया गया था. अब इनमें से दो युवकों के शव के अवशेष को लंबी प्रक्रिया और पहचान के बाद भारत लाया गया है और उनके परिजनों को सौंप दिया गया है.
आजमगढ़ और मऊ जिलों के कई युवक नौकरी की तलाश में एजेंटों के जाल में फंसकर साल 2024 में रूस चले गए थे. इनमें इनमें से आजमगढ़ के कन्हैया यादव और मऊ के श्यामसुंदर और सुनील यादव की रूस- यूक्रेन जंग के बीच मौत की खबर आ चुकी थी. वहीं, आजमगढ़ के राकेश यादव और मऊ के बृजेश यादव घायल होने के बाद एक साल पूर्व ही घर लौट आए थे.
वहीं, विनोद, जोगेंद्र यादव, अरविंद यादव, रामचंद्र, अजहरुद्दीन खान, हुमेश्वर प्रसाद, दीपक, धीरेंद्र कुमार लापता हो गए थे. उनका अब तक पता नहीं चल पाया. परिवार के लोगों का कहना है कि सभी युवकों को मऊ के एजेंट विनोद यादव ने फंसाया था. गार्ड की नौकरी के बहाना देकर उन्हें ले जाया गया. फिर रूस और यूक्रेन के युद्ध में धकेल दिया गया.
दो साल बाद आजमगढ़ पहुंचा मृतकों का शव
अब तकरीबन 2 साल बाद आजमगढ़ के गुलामी का पूरा निवासी अजहरुद्दीन और आराजी देवारा करखिया निवासी रामचंद्र के शव उनके घर पहुंचे है. परिजनों के अनुसार दोनों की मौतें करीब दो वर्ष पहले हो चुकी थीं. लंबी प्रक्रिया और पहचान के बाद उनके अवशेष भारत लाए जा सके.
सरकार कार्रवाई करे-पीड़ित परिवारों की मांग
अजहरुद्दीन के भाई अजीमुद्दीन ने बताया कि वह दो साल से अपनी सऊदी की नौकरी छोड़कर भाई की तलाश में भटक रहे था . यहां एंबेसी से लेकर रूस तक भागदौड़ और मशक्कत के बाद सरकार की मदद से भाई के शव का अवशेष मिल सका है. उन्होंने कहा कि यह बहुत बड़ा स्कैम है. बड़ी संख्या में लोग इसमें फंसे हुए हैं. सरकार को इसपर कार्रवाई करनी चाहिए.
अजहरुद्दीन के भाई अजीमुद्दीन ने कहा कि हमारी सरकार से मांग है कि हमारे भाई की सैलरी और जो भी बकाया फंसा है उसे दिलाया जाए. रूस में अब भी कई ऐसे भारतीयों की बॉडी पड़ी हुई हैं, जिनकी शिनाख्त काफी मुश्किल है. अजहरुद्धीन की डेड बॉडी की पहचान भी डीएनए सैंपलिंग के माध्यम से हुई है. हमारी मांग है इस मामले से संबंधित एजेंटों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए.
परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल
प्रशासन की ओर से दोनों शवों को वाराणसी एयरपोर्ट से लाकर परिजनों तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई थी. तहसीलदार विवेकानंद, वाराणसी एयरपोर्ट पहुंचे और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कर शवों को परिजनों के सुपुर्द किया. शव पहुंचने के बाद दो साल तक अपने बेटे और भाई के लिए भटकने वाले परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है.
