भृगु आश्रम कॉरिडेर का आर्किटेक्ट प्लान अप्रूव, ददरी मेला क्षेत्र भी होगा कवर; इतनी आएगी लागत
बलिया में महर्षि भृगु आश्रम कॉरिडोर का आर्किटेक्ट प्लान स्वीकृत हो गया है. ₹65 करोड़ से अधिक की लागत से बनने वाला यह कॉरिडोर भृगु आश्रम, गंगा नदी और ऐतिहासिक ददरी मेला क्षेत्र को कवर करेगा. इसका उद्देश्य श्रद्धालुओं की भीड़ का प्रभावी प्रबंधन और क्षेत्र के पौराणिक महत्व को बढ़ाना है. यह परियोजना बलिया के धार्मिक और पर्यटन विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी.
उत्तर प्रदेश के बलिया में प्रस्तावित महर्षि भृगु आश्रम कॉरिडोर का आर्किटेक्ट प्लान अप्रव हो गया है. इस कॉरिडोर का निर्माण करीब 10520 वर्ग मीटर भूमि पर किया जाएगा. इसमें भृगु आश्रम के अलावा पवित्र गंगा नदी और ऐतिहासिक ददरी मेला क्षेत्र को भी जोड़ा गया है. इस कॉरिडोर के आर्किटेक्ट प्लान में ददरी मेले दौरान होने वाली भीड़ का खास ध्यान रखा गया है. यह कॉरिडोर करीब 65 करोड़ से अधिक की लागत से बनेगा. इसमें करीब 5 करोड़ की संपत्ति अधिग्रहण भी की जानी है.
इस आर्किटेक्ट प्लान को लेकर बलिया के मुख्य राजस्व अधिकारी की अध्यक्षता वाली कमेटी ने शुक्रवार को भृगु कमेटी, चित्रगुप्त कमेटी सहित पुजारियों के साथ बातचीत की. इसमें विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा करते हुए प्लान को मंजूरी दी गई. इस कमेटी के सदस्य नगर मजिस्ट्रेट बलिया, अधिशासी अभियंता लोक निर्माण विभाग, एसडीएम सदर और अधिशासी अधिकारी नगर पालिका परिषद मौजूद रहे.

50 लाख से अधिक जुटते हैं श्रद्धालु
बलिया के पौराणिक भृगु मंदिर में कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर भव्य मेला लगता है. इस दौरान यहां पवित्र गंगा और सरयू के संगम में स्नान के लिए 5 लाख से अधिक श्रद्धालु आते हैं. वहीं ददरी मेला दौरान यहां श्रद्धालुओं और मेलार्थियों की संख्या 50 लाख से अधिक होती है. इसके अलावा गुरु पूर्णिमा, दीपावली, होली सहित अनेक त्योहारों के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां आकर दर्शन पूजन करते हैं.
क्या है भृगु आश्रम का पौराणिक महत्व?
पौराणिक मान्यता के अनुसार बलिया में भृगु आश्रम का अस्तित्व सतयुग में था. त्रिदेवों की परीक्षा के बाद जब भृगु मुनि को ग्लानि का एहसास हुआ तो वह ब्रह्मा के कहने पर अपनी पत्नी के साथ बलिया आ गए थे और यहां हजारों साल तक उन्होंने तपस्या और वैज्ञानिक अनुसंधान किए थे. उसी समय वह अयोध्या तक प्रवाहित होने वाली सरयू की धारा को अपने शिष्य दर्दर मुनि के सहयोग से खींचकर बलिया लाकर गंगा में मिला दिए थे.

ज्योतिष में किया सबसे बड़ा प्रयोग
महर्षि भृगु ने इसी भृगु आश्रम में ज्योतिष के सबसे बड़े ग्रंथ भृगु संहिता की रचना की थी. यहीं पर उन्होंने ज्योतिष के सूत्रों का प्रयोग भी किया था. इसी दौरान उन्हें पता चला कि कलियुग के द्वितीय चरण में बिहार में प्रवेश करते ही गंगा सूख जाएंगी. गंगा की धारा को अविरल बनाए रखने के लिए उन्होंने अयोध्या जाकर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ की अनुमति से सरयू की धारा को गंगा में मिलाने का फैसला किया था.

यहीं पर हुआ शुक्राचार्य का जन्म
पौराणिक कथाओं के मुताबिक महर्षि भृगु के तेजस्वी पुत्र शुक्राचार्य का जन्म भी इसी आश्रम में हुआ. प्राथमिक शिक्षा भी शुक्राचार्य ने इसी आश्रम में हासिल की, लेकिन बाद में वह वेदाध्ययन के लिए महर्षि आंगिरस के आश्रम चले गए. फिर अस्त्र, शस्त्र, शास्त्र और कर्मकांड में महारत हासिल करने के लिए शुक्राचार्य महर्षि के अगस्त के आश्रम गए. उन्हीं दिनों देवगुरु की पदवी के लिए शुक्राचार्य की वृहस्पति से ठन गई थी.
