देश का पहला इच्छामुत्यु: पंचतत्व में विलीन हुए हरीश राणा, छोटे भाई ने दी मुखाग्नि

13 साल कोमा में रहने के बाद हरीश राणा ने मंगलवार यानी 24 मार्च को आखिरी सांस ली. आज यानी 25 मार्च को सुबह दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया. हरीश राणा को उनके छोटे भाई आशीष ने मुखाग्नि दी. इस दौरान परिवार के लोगों में आंसू थे.

हरीश राणा का अंतिम संस्कार

गाजियाबाद के राजनगर एक्शटेंशन निवासी हरीश राणा 13 सालों से कोमा में थे. वह लगातार जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहे थे. अब आखिरकार उनको मुक्ति मिल गई है. 13 साल का इंतजाम खत्म हो गया है. 32 वर्षीय हरीश ने मगंलवार यानी 24 मार्च की शाम को आखिरी सांस ली. साथ ही आज यानी 25 मार्च को सुबह 9.30 मिनट पर दिल्ली के ग्रीन पार्क स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार कर दिया गया

हरीश राणा को उनके छोटे भाई आशीष ने मुखाग्नि दी. इस दौरान परिवार के लोगों में आंसू थे. हरीश के अंतिम संस्कार में उनकी राजनगर एक्सटेंशन स्थित राज एम्पायर सोसायटी से भी बड़ी संख्या में परिवार के करीबी लोग और स्थानीय निवासी पहुंचे. सभी ने नम आंखों से हरीश राणा को विदाई दी.

14 मार्च को हरीश को एम्स में कराया गया था भर्ती

सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों से सलाह और माता-पिता से बातचीत के बाद हरीश को 11 मार्च को इच्छामृत्यु की अनुमति दी थी. इसके बाद 14 मार्च को हरीश को एम्स में भर्ती कराया गया था. वहां पर दर्दरहित मृत्यु की प्रक्रिया को पूरा कराया गया. जीवनरक्षक उपकरणों को हटाए जाने के बाद उन्होंने आखिरी सांस ली.

2013 अपनी पीजी के चौथी मंजिल से गिर गए थे हरीश

हरीश राणा 2013 में चंडीगढ़ में पीजी में एक हादसे में गिर जाने से कोमा में चले गए थे. उनके परिजनों ने कई अस्पतालों में उनका इलाज कराया, लेकिन उनकी स्थिति में सुधार नहीं हुआ. बच्चे की तकलीफ देख माता-पिता ने हरीश इच्छा मृत्यु देने के लिए कोर्ट में आवेदन किया था. काफी सोच-विचार और चिकित्सकों की सलाह के बाग सुप्रीम कोर्ट ने इच्छा मृत्यु की मंजूरी दी थी.

इससे पहले भी दो बार मांग चुके थे इच्छा मृत्यु

हरीश के माता-पिता ने इससे पहले भी दो बार 2018 और 2023 में सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की गुहार लगाई, लेकिन अदालत ने दोनों ही बार परिवार की याचिका ठुकरा दी थी. फिर परिवार तीसरी बार इच्छा मृत्यु के लिए अनुमति मांगी. लेकिन इस बार इच्छामृत्यु की अनुमति दे दी है. यह देश में इच्छामृत्यु का पहला मामला होगा.

इलाज में बेचना पड़ा था घर

हरीश के इलाज में उनके पिता ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी. बल्कि अपना दिल्ली वाला घर तक बेच दिया. इसके बाद उनका पूरा परिवार गाजियाबाद में एक छोटे से फ्लैट में रह रहा था. माता-पिता को इस बात की चिंता थी कि उनके ना रहने पर उनके बेटे की देखभाल कौन करेगा. ऐसे में अपने कलेजे पर पत्थर रखकर उन्होंने अपने लाडले को अंतिम विदाई दे दी.

Follow Us