200 ग्राम चांदी और 1 ग्राम सोने से तैयार होती है गाजीपुर की ये साड़ी, सरकार दे रही 45 दिनों की मुफ्त ट्रेनिंग
ग़ाज़ीपुर में सदियों पुरानी जामदानी साड़ी की बुनाई फिर से जीवंत हो उठी है. भारत सरकार का हैंडलूम विभाग महिलाओं को मुफ्त ट्रेनिंग देकर इस पारंपरिक कला को बचा रहा है. ये साड़ियां 100% कच्चे कॉटन और सोने-चांदी की जरी से बनती हैं, जिन्हें दोनों तरफ से पहना जा सकता है.
गाजीपुर अब सिर्फ अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी सदियों पुरानी बुनकरी की विरासत को नए दौर में फिर से जीवंत करने के लिए भी चर्चा में है. नंदगंज इंडस्ट्रियल एरिया में जामदानी साड़ी निर्माण का काम फिर से शुरू हुआ है. इस लुप्त होती कला को बचाने के लिए भारत सरकार ने बड़ी पहल की है.
भारत सरकार का हैंडलूम विभाग इस कला को बचाने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए 45 दिनों का निशुल्क प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चला रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा पारंपरिक बुनाई का हुनर सीख रहे हैं. जामदानी साड़ी अपनी अनूठी बुनावट और शानदार डिजाइन के कारण देश-विदेश में अलग पहचान रखती है.
‘इसे फ्रंट और बैक, दोनों ओर से पहना जा सकता है’
यह सिर्फ एक साड़ी नहीं… बल्कि सदियों से चली आ रही भारतीय बुनकरी की एक अनमोल विरासत है. गाजीपुर के नंदगंज इंडस्ट्रियल एरिया में फिर से जामदानी साड़ियों की बुनाई शुरू हो चुकी है. यहां तैयार होने वाली साड़ियां अपनी बारीक कारीगरी और शाही अंदाज के लिए जानी जाती हैं. इस साड़ी की बुनाई सोने-चांदी के धागों से होती है.
इन साड़ियों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे 100 प्रतिशत कच्चे कॉटन के कपड़े पर तैयार किया जाता है और इसकी बुनाई इतनी महीन होती है कि साड़ी दोनों तरफ से एक जैसी दिखाई देती है. यानी इसे फ्रंट और बैक, दोनों ओर से पहना जा सकता है. इस शाही साड़ी की भव्यता का सबसे बड़ा कारण इसमें इस्तेमाल होने वाली कीमती जरी है.
विशेष डिजाइन वाली साड़ियों में कई महीने लग जाते हैं
कारीगरों के मुताबिक, जरी में करीब 98 प्रतिशत चांदी और 2 प्रतिशत सोने का उपयोग होता है. एक जामदानी साड़ी तैयार करने में लगभग 150 से 200 ग्राम चांदी और करीब एक ग्राम सोना लगता है. यही वजह है कि इसकी कीमत चांदी और सोने के बाजार भाव के अनुसार बदलती रहती है. साथ ही साड़ियों को बुनने में कई महीने का समय भी लग जाता है.
सामान्य डिजाइन की एक साड़ी तैयार करने में 35 से 40 दिन का समय लगता है, जबकि जटिल और विशेष डिजाइन वाली साड़ियों को तैयार करने में कई महीने लग सकते हैं. गाजीपुर के अनुभवी कारीगर शहाबुद्दीन अंसारी बताते हैं कि पांच वर्ष पहले उन्होंने करीब ढाई लाख रुपये कीमत की एक विशेष जामदानी साड़ी तैयार की थी.
यह सांस्कृतिक धरोहर, बचाना बेहद जरूरी- कारोबारी
शहाबुद्दीन अंसारी का कहना है कि यह कला धैर्य, अनुभव और महीन मेहनत का परिणाम है. हर धागा और हर डिजाइन कारीगर की वर्षों की साधना को दर्शाता है. इस दुर्लभ कला को जीवित रखने के लिए भारत सरकार का हैंडलूम विभाग आगे आया है. कारीगरों का कहना है कि यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक धरोहर है, जिसे बचाना बेहद जरूरी है.
