गजनवी ने इस मंदिर में शिवलिंग पर खुदवा दिया था कलमा, स्वयंभू हैं नीलकंठ महादेव; जानें पूरी कहानी

गोरखपुर के खजनी में स्थित स्वयंभू नीलकंठ महादेव मंदिर का इतिहास अनोखा है. महमूद गजनवी ने इस मंदिर को ध्वस्त कर शिवलिंग पर कलमा खुदवा दिया था, जिसके निशान आज भी हैं. बावजूद इसके, शिवलिंग को क्षति नहीं पहुंची. सावन में यहां भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, जो इस प्राचीन मंदिर की महिमा को दर्शाता है.

गोरखपुर में नीलकंठ महादेव मंदिर

सावन शुरू होने के साथ ही उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में खजनी स्थित नीलकंठ महादेव के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचने लगे हैं. गोरखपुर शहर से करीब 25 किलोमीटर दूर खजनी के सरया तिवारी गांव में विराजमान नीलकंठ महादेव की कई कहानियां चर्चा में हैं. मान्यता है कि इस मंदिर में शिवलिंग स्वयंभू है. विदेशी आक्रांता महमूद गजनवी ने इस मंदिर को तोड़ दिया था. शिवलिंग को भी क्षतिग्रस्त करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हआ.

आखिर में उसने शिवलिंग के ऊपर खुदवाकर कलमा लिखवा दिया था. आज भी शिवलिंग के ऊपर खोदकर कुछ लिखे होने के निशान साफ नजर आते है. इस शिवलिंग की महिमा दूर-दूर तक विख्यात है. इसलिए हर साल सावन शुरू होने के साथ ही गोरखपुर और आसपास के कई जिलों से लोग भोलेनाथ के दर्शन पूजन के लिए यहां आते हैं. सावन के पूरे महीने यहां मेला लगता है. श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए इस मंदिर तक आवागमन के लिए साधन भी उपलब्ध कराए गए हैं.

अति प्राचीन हैं नीलकंठ महादेव

भगवान भालेनाथ के इस मंदिर का वास्तविक इतिहास किसी को नहीं पता. कहा जाता है कि हजारों साल नीलकंठ महादेव का यह मंदिर विराजमान है. इस मंदिर में विराजमान शिवलिंग को स्वयंभू कहा जाता है. मुगल काल से पहले जब महमूद गजनवी ने भारत पर आक्रमण किया था तो वह गोरखपुर आया था. उसने मंदिर की प्रसिद्धि सुनी तो खुद यहां आया और मंदिर को ध्वस्त करा दिया. उसने शिवलिंग को भी तोड़ने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुआ.

शिवलिंग पर लिखवाया कलमा

आखिर में थकहार कर उसने शिवलिंग को छोड़ तो दिया, लेकिन इसके ऊपर अरबी भाषा में कलमा “ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” लिखवा दिया. इस लिखावट के निशान आज भी शिवलिंग के ऊपर साफ नजर आते हैं. इस गांव में रहने वाले धरणीधर त्रिपाठी के मुताबिक एक समय यहां भारी बारिश हुई तो यहां की मिट्टी बह गई थी. इसकी वजह से ढेर सारे नरकंकाल दिखाई देने लगे थे. माना जाता है कि ये कंकाल भी महमूद गजनवी के आक्रमण के समय के हैं.

खिलजी ने भी किया था तोड़फोड़

धरणीधर त्रिपाठी कहते हैं कि मोहम्मद गजनवी के बाद उसके सेनापति रहे बख्तियार खिलजी ने भी इस मंदिर पर हमला किया और तोड़फोड़ की थी. उन्होंने कहा कि उस घटना के बाद इस मंदिर को बनाने की कई बार कोशिश हुई. खासतौर से मंदिर की छत लगाने का प्रयास किया गया, लेकिन आज तक छत नहीं लग पायी है. जब भी लोग छत लगाने की कोशिश करते, थोड़ी ही देर बाद छत गिर जाती है.

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