डिप्रेशन की दवा असर करेगी या नहीं, 7-10 दिन में चलेगा पता! IIT कानपुर की रिसर्च से जगी उम्मीद

IIT कानपुर के शोधकर्ताओं ने डिप्रेशन की दवा के असर का पता सिर्फ 7 से 10 दिनों में लगाने का तरीका खोजा है. यह शोध EEG और EGG के विद्युत संकेतों का उपयोग करता है. इससे मरीजों को कई हफ्तों तक इंतजार नहीं करना पड़ेगा और सही दवा चुनने में मदद मिलेगी.

डिप्रेशन की दवा का असर अब 1 हफ्ते में पता चलेगा (AI Image)

डिप्रेशन के मरीजों के लिए सही दवा चुनने में अक्सर कई सप्ताह लग जाते हैं. इसकी वजह यह है कि किसी एंटीडिप्रेसेंट का असर मरीज पर होगा या नहीं, इसका पता आमतौर पर चार से छह सप्ताह बाद चलता है. ऐसे में अगर दवा काम न करे तो इलाज बदलने में भी काफी समय निकल जाता है. अब IIT कानपुर के एक अध्ययन ने इस मुश्किल को कम करने की उम्मीद जगाई है.

IIT कानपुर के कॉग्निटिव साइंस विभाग और जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज, कानपुर के शोधकर्ताओं ने मिलकर ऐसा तरीका विकसित किया है, जिससे दवा शुरू करने के सिर्फ 7 से 10 दिन के भीतर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि मरीज को आगे उपचार से कितना फायदा मिलने की संभावना है.

दिमाग और पेट के संकेतों से मिलेगी जानकारी

शोध में मस्तिष्क और पेट की विद्युत गतिविधियों को देखा गया. इसके लिए इलेक्ट्रोएन्सेफेलोग्राफी (EEG) से दिमाग के संकेत और इलेक्ट्रोगैस्ट्रोग्राफी (EGG) से पेट की विद्युत गतिविधियां रिकॉर्ड की गईं. इन संकेतों को मरीज के लक्षणों और चिकित्सीय जानकारी के साथ मिलाकर देखा गया. इस अध्ययन में कुल 206 लोगों को शामिल किया गया था.

इनमें 144 ऐसे मरीज थे, जिन्होंने इससे पहले डिप्रेशन का इलाज नहीं कराया था. इलाज शुरू होने के समय और करीब एक सप्ताह बाद उनके EEG और EGG संकेत लिए गए. इसके बाद इन शुरुआती आंकड़ों के आधार पर 4 से 6 सप्ताह बाद मिलने वाले उपचार के परिणाम का अनुमान लगाया गया.

जांच करने पर कुल सटीकता 77.3 प्रतिशत रही

शोधकर्ताओं के अनुसार, तैयार किए गए मॉडल ने उन मरीजों की पहचान करने में 84 प्रतिशत संवेदनशीलता और 78 प्रतिशत विशिष्टता दिखाई, जिन्हें उपचार से अपेक्षित लाभ नहीं मिलने की संभावना थी. एक अलग मरीज समूह में जांच करने पर इसकी कुल सटीकता 77.3 प्रतिशत रही.

अध्ययन की कॉरस्पॉडिंग ऑथर और आईआईटी कानपुर की सहायक प्रोफेसर डॉ. प्रगति प्रियदर्शिनी बालासुब्रमणि ने बताया कि इलाज के शुरुआती दिनों में दिमाग और पेट से मिलने वाले संकेत मरीज की संभावित प्रतिक्रिया के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दे सकते हैं.

मरीज के अनुसार इलाज तय करने में मिलेगी मदद

वहीं, प्रथम लेखक और पीएचडी शोधार्थी अमल जूड एश्विन फ्रांसिस के मुताबिक, अलग-अलग मरीजों में डिप्रेशन के लक्षण अलग जैविक गतिविधियों से जुड़े हो सकते हैं. यही वजह है कि एक ही दवा का असर हर मरीज पर एक जैसा नहीं होता. शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तरीका भविष्य में मरीज के अनुसार इलाज तय करने में मदद कर सकता है.

हालांकि, इसे बड़े स्तर पर इस्तेमाल करने से पहले अलग-अलग जगहों और अधिक मरीजों पर इसकी आगे जांच जरूरी होगी.
अध्ययन से जुड़ी तकनीकें फिलहाल न्यूरोक्लिनिकल इनोवेटिव सॉल्यूशंस (NCIS) प्राइवेट लिमिटेड के माध्यम से उपलब्ध हैं.

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