UP में SIR: क्या होता है Form 7? जिसे अखिलेश बता रहे हैं ‘वोट काटने का हथियार’
यूपी में मतदाता सूची शुद्धिकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म 7 को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है. सपा प्रमुख अखिलेश यादव का आरोप है कि भाजपा इसे 'वोट काटने का हथियार' बना रही है, जिससे विपक्षी मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं. आइए समझते हैं कि इसमें हकीकत क्या है और फॉर्म 7 की प्रक्रिया क्या है?
भारतीय चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के शुद्धिकरण के लिए कराए गए एसआईआर को लेकर काफी बवाल हुआ. इसी प्रॉसेस में अब नया बवाल फॉर्म 7 को लेकर शुरू हो गया है. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का आरोप है कि भाजपा और उत्तर प्रदेश सरकार इस फार्म को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है. उनके मतदाताओं को चिन्हित कर उनके नाम से प्रिंटेड फॉर्म 7 तैयार कराए गए हैं और नाम काटने के लिए सभी बीएलओ को दिया जा रहा है.
उत्तर प्रदेश के जौनपुर में ऐसा ही एक मामला सामने आने के बाद प्रदेश में बवाल बढ़ गया है. सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने इसी विषय पर प्रेस कांफ्रेंस भी किया है. ऐसे में समझ लेना जरूरी है कि यह फॉर्म 7 है क्या और क्या यह सही में नाम काटने का हथियार हो सकता है? इसी के साथ यह भी जान लेना जरूरी है कि इसको लेकर इतना बवाल क्यों है. आइए शुरू से शुरू करते हैं. दरअसल, भारतीय चुनाव व्यवस्था में वोटर लिस्ट में सुधार की सतत प्रक्रिया चलती है. इसमें नए मतदाताओं के नाम जोड़ने, मृत मतदाताओं के नाम हटाने या जीवित मतदाताओं के विवरण में संशोधन करने का काम होता है.
नाम काटने के लिए है फार्म
चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक फार्म सात का प्रयोग हमेशा से नाम काटने के लिए होता रहा है. पहले फार्म सात भरने के लिए किसी मतदाता के पड़ोसी या उसकी अपने बूथ पर दर्ज कोई अन्य मतदाता ही पात्र होते थे. इसके अलावा बीएलओ भी रूटीन सर्वे के बाद इस फार्म का इस्तेमाल कर सकता था. साल 2023 में चुनाव आयोग ने इसमें छोटा सा संशोधन किया. व्यवस्था दी कि कोई भी व्यक्ति किसी भी व्यक्ति का फार्म 7 भर सकता है. इसके बाद चुनाव आयोग इसकी जांच कर नाम हटा सकेगा.
क्या केवल फॉर्म 7 से ही कट जाते हैं नाम?
इस हंगामे में एक सवाल और लोगों को भ्रमित कर रहा है. वह सवाल यह है कि क्या केवल फॉर्म 7 भर जाने से नाम कट जाएगा? इसका जवाब है कि नहीं. दरअसल फॉर्म 7 बीएलओ के पास जमा होता है. इसके बाद बीएलओ द्वारा इसकी रिकॉर्ड बनाकर उप जिला निर्वाचन अधिकारी को सूचित करता है. फिर फॉर्म में वर्णित व्यक्ति, फॉर्म भरने वाले व्यक्ति की जांच कराई जाती है. इसके आधार पर बीएलओ अपने रिकॉर्ड को अपडेट करता है. इसके बाद उपजिला निर्वाचन अधिकारी द्वारा संबंधित को नोटिस जारी किया जाता है और पूरी तरह संतुष्ठ होने के बाद ही वोटर लिस्ट से नाम हटाया जाता है.
क्यों हटाए जाते हैं नाम?
कायदे से वोटर लिस्ट में उन्हीं लोगों के नाम हो सकते हैं, जिन्होंने 18 साल की आयु पूरी कर ली हो. ऐसे में जब किसी मतदाता की मौत होती है या फिर देश की नागरिकता छोड़ देता है तो उसके नाम से फॉर्म सात भरा जाता है. आम तौर पर बीएलओ यह फॉर्म उस व्यक्ति के परिजन या पड़ोसी से भरवाकर उससे हस्ताक्षर करवाते हैं. इसके बाद लिस्ट से उस व्यक्ति के नाम हटा दिए जाते हैं. इसके अलावा अवैध तरीके से भारत में रह रहे लोगों की भी पहचान होने के बाद उनके नाम से फॉर्म सात भरकर वोटर लिस्ट से नाम हटाया जाता है.
क्यों भड़का बवाल?
इस फार्म 7 को लेकर विपक्षी दल सरकार पर लगातार हमलावर हैं. उनके आरोप हैं कि भाजपा ने विपक्षी दलों के वोट करने वाले मतदाताओं की पहचान कराने के बाद एक सुनियोजित साजिश के तहत फॉर्म 7 छपवाए हैं और अब यही फॉर्म 7 सभी बीएलओ को देकर इन लोगों के नाम काटने के लिए दबाव बनाया जा रहा है. उत्तर प्रदेश के जौनपुर में सामने आया मामला भी इसका एक उदाहरण है. इन सब मामलों का उल्लेख करते हुए सपा सुप्रीमो कई बार वीडियो बयान जारी कर चुके हैं और मंगलवार को उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस कर प्रदेश सरकार, भाजपा और चुनाव आयोग पर जोरदार हमला बोला है.