क्यों बंद हुआ लखनऊ का 88 साल पुराना कॉफी हाऊस, अटल से लेकर मुलायम तक… सभी करते थे बैठकी
लखनऊ का 88 साल पुराना ऐतिहासिक इंडियन कॉफी हाउस बंद हो गया है. यह दशकों तक राजनीतिज्ञों, साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का महत्वपूर्ण केंद्र रहा, जहां अटल, नेहरू जैसे नेताओं ने बहसें की. इसका बंद होना लखनऊ के बौद्धिक विमर्श के एक युग का अंत दर्शाता है, जो शहर की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा था.
उत्तरप्रदेश की राजधानी लखनऊ में हजरतगंज की पहचान सिर्फ उसकी चमकती दुकानों, नवाबी अंदाज और शाम की रौनक से नहीं है. यहीं पर एक ऐसी जगह भी है, जो दशकों तक कॉफी की चुस्कियों के साथ देश और प्रदेश की राजनीति ही नहीं साहित्य और समाज की दिशा पर बहस की साक्षी बनी. यह जगह है इंडियन कॉफी हाउस. आज इसी ऐतिहासिक कॉफी हाउस पर ताला लटक गया है. तीन महीने से बंद पड़े इस कॉफी हाउस का शुभारंभ 1938 में हुआ था.
यह उस संस्कृति का गवाह रहा है, जहां किसी टेबल पर पत्रकार बैठे होते थे, तो दूसरी टेबल पर नेता, लेखक, कवि और सामाजिक कार्यकर्ता. कभी यहां आने के लिए किसी निमंत्रण की जरूरत नहीं होती थी. एक कप कॉफी मंगाइए और घंटों बहस का हिस्सा बन जाइए. राजनीति से लेकर साहित्य, सामाजिक मुद्दों से लेकर देश-दुनिया की घटनाओं तक हर विषय पर यहां चर्चा होती थी.
नेताओं का पसंदीदा अड्डा
इसी वजह से इंडियन कॉफी हाउस को लखनऊ के बौद्धिक और राजनीतिक जीवन का अहम केंद्र माना जाता रहा. पुराने दौर में पत्रकारों, साहित्यकारों, प्रोफेसरों, कलाकारों और ट्रेड यूनियन नेताओं के साथ बड़े-बड़े राजनेताओं की भी यहां नियमित आवाजाही थी. जवाहरलाल नेहरू, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. राम मनोहर लोहिया, फिरोज गांधी, वीपी सिंह, एनडी तिवारी, वीर बहादुर सिंह और चंद्रशेखर जैसे नेताओं के यहां आने की यादें आज भी इससे जुड़े लोगों के बीच सुनाई जाती हैं.
इस्तीफा देकर काफी हाउस पहुंचे थे सीएम
कॉफी हाउस से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का किस्सा भी शामिल है. बताया जाता है कि जब वीर बहादुर सिंह ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया तो वे सीधे कॉफी हाउस पहुंचे और यहां बैठकर कॉफी पी. उनके लिए यह जगह सत्ता से बाहर होने के बाद भी अपनी पुरानी दुनिया में लौटने जैसा था. वीर बहादुर सिंह मुख्यमंत्री रहते हुए भी यहां आते थे. खास बात यह थी कि उनकी सुरक्षा और स्टाफ बाहर इंतजार करते थे और वे अंदर आम लोगों के बीच बैठकर बातचीत करते थे.
चंद्रशेखर ने भी लगाई हाजिरी
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का भी इस जगह से खास रिश्ता था. 2002 में जब वह लखनऊ पहुंचे तो कॉफी हाउस जाना उनकी प्राथमिकताओं में शामिल था. पुराने लोगों के मुताबिक वह यहां आकर कॉफी पीते और पुराने परिचितों से मिलते थे. यहां आने वाले लोगों की फेहरिस्त में सिर्फ राजनेता ही नहीं थे. अमृतलाल नागर, यशपाल, मजाज लखनवी, कैफी आजमी और दूसरे साहित्यकारों व पत्रकारों की मौजूदगी ने इसे साहित्यिक बहसों का भी बड़ा केंद्र बनाया.
एक कप कॉफी और घंटों की बहस
कॉफी हाउस की सबसे बड़ी खासियत उसका माहौल था. यहां किसी नेता को उसके पद के कारण विशेष सम्मान मिलना जरूरी नहीं था. एक मेज पर मुख्यमंत्री भी आम लोगों की तरह बैठता था और पत्रकार या छात्र भी उसी बहस में अपनी बात रख सकते थे. यही बेबाक माहौल इसकी पहचान बना. पुराने दौर के लोग बताते हैं कि यहां आने वाले राजनेता भी आम लोगों की बातें सुनते थे. कई बार तीखी बहस होती, लेकिन चर्चा का सिलसिला चलता रहता.
कॉफी हाउस पर भी दिखा बदलाव का असर
समय के साथ लखनऊ बदला. कैफे कल्चर आया, बड़े ब्रांड आए और कॉफी पीने का अंदाज भी बदल गया. लेकिन इंडियन कॉफी हाउस अपने पुराने अंदाज में लंबे समय तक टिका रहा.आज जब डिजिटल दौर में राजनीतिक बहसें सोशल मीडिया पर हो रही हैं, कॉफी हाउस का खाली पड़ा होना एक दौर के खत्म होने का एहसास कराता है. यह वही जगह है जहां कभी नेता और पत्रकार आमने-सामने बैठते थे, साहित्यकार अपनी रचनाओं पर चर्चा करते थे और शहर के बुद्धिजीवी घंटों देश-दुनिया पर बहस करते थे.
अब खल रही इसकी कमी
समाजवादी चिंतक दीपक मिश्र का मानना काफ़ी हॉउस केवल एक स्थान अथवा भवन नहीं, अपितु भारतीय राजनीतिक विमर्श का रेखांकित करने योग्य अध्याय है. यहां से कई बहसों का सूत्रपात हुआ, लोकतंत्र को गुणात्मक ताकत शक्ति मिली. लोहिया के लखनऊ प्रवास के दौरान काफ़ी हॉउस देश के समाजवादी आंदोलन का स्वतः केंद्र बन जाता था. इसे बचाना समूचे समाज की जिम्मेदारी है.
