मुस्लिम बचाएं या दलित-पासी? कसमंडी किले पर दुविधा में अखिलेश, पैदा हुआ राजनीतिक संकट
लखनऊ के कसमंडी किले पर मुस्लिम और दलित-पासी समाज के दावों से अखिलेश यादव की सपा बड़ी दुविधा में है. मुस्लिम इसे मस्जिद मानते हैं, जबकि पासी इसे कंस पासी का किला बताते हैं. अखिलेश न मुस्लिमों को नाराज़ कर सकते हैं, न ही दलित-पासियों को, जो उनके पीडीए का हिस्सा हैं. यह विवाद सपा के लिए गहरा राजनीतिक संकट बन गया है, जबकि भाजपा इसे अवसर मान रही है.
उत्तर प्रदेश में राजधानी लखनऊ के कसमंडी किले का विवाद सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव के गले का फांस बन गया है. दो समुदायों के बीच का यह विवाद समाजवादी पार्टी को उगलते बन रहा है और निकलते बन रहा. इसकी वजह भी बड़ी है. दरअसल मुस्लिम समाज इस किले को मस्जिद और मजार बता रहा, जबकि दलित पासी समाज के लिए इसे कंसा पासी का किला बता रहे हैं. मुस्लिम समाज के लोग इस किले में नमाज पढ़ना चाहते हैं, वहीं दलित पासी समाज के लोग इसमें हनुमान चालिसा पढ़ने के लिए आंदोलन कर रहे हैं.
अब सपा की मुश्किल ये है कि अखिलेश यादव मुस्लिम समाज का समर्थन कर दलित पासी समाज का नाराज नहीं कर सकते. ये वर्ग उनके पीडीए का हिस्सा है और पिछले लोकसभा चुनावों में इस वर्ग का मजबूत समर्थन मिला था. वहीं दलित पासी समाज का समर्थन कर मुस्लिम समाज की नाराजगी वह सपने में भी मोल नहीं ले सकते. क्यों कि मुस्लिम वोट ही उनका कोर वोट है. बड़ा बात यह कि इस विवाद में सपा तटस्थ की भी भूमिका नहीं निभा सकती. कारण दोनों समाज के लोगों को सपा से सहयोग की अपेक्षा है.
बीजेपी के लिए अवसर बना यह विवाद
यह मामला एक तरफ जहां सपा समेत समस्त विपक्षी दलों के लिए राजनीतिक संकट बन गया है, वहीं बीजेपी के लिए सुनहरा अवसर भी साबित हो रहा है. बीजेपी को मुस्लिम समाज का समर्थन मिलने की गुंजाइश कम ही है, लेकिन इस विवाद में बीजेपी पासी समाज का समर्थन कर अगले विधानसभा चुनावों में दलित पासी समाज का समर्थन हासिल कर सकती है. इसके लिए बीजेपी ने कवायद शुरू भी कर दी है. कारण का अब तक यह दलित पासी समाज सपा का मजबूत समर्थक रहा है. ऐसे में यदि बीजेपी इस वर्ग को अपनी तरफ डायवर्ट कर लेती है तो सपा को यह बड़ा झटका होगा.
क्या है मामला?
अभी हाल ही में लखनऊ के मलीहाबाद स्थित कसमंडी के किले को लेकर काफी बवाल हुआ था. लखन आर्मी के सदस्य सूरज पासी के नेतृत्व में दलित पासी समाज ने इस किले पर दावा किया था. कहा था कि यह इमारत एक प्राचीन किला है, जिसमें भगवान शिव का मंदिर है. इसे 11वीं सदी में राजा कंसा पासी ने बनवाया था. वहीं मुगल काल से इस इमारत पर काबिज मुस्लिम समाज के लोगों का कहना है कि यह एक पुरानी मजार और मस्जिद है. यह नमाज भी होती रही है.
सरकारी रिकॉर्ड में क्या?
मुस्लिम पक्ष का दावा है कि वक्फ बोर्ड के रिकॉर्ड में भी यह इमारत दर्ज है. इसमें इस जमीन को कब्रिस्तान के तौर पर दर्ज किया गया है. वहीं पास में मस्जिद बताई गई है, जहं नमाज पढ़ी जाती रही है. कुछ अन्य सरकारी दस्तावेजों में भी इसे मुस्लिम इमारत ही बताया गया है. जबकि पासी समाज का कहना है कि मुगल काल से पहले यह हिन्दू मंदिर और किला था, बाद में इसमें नमाज पढ़ी जाने लगी. लेकिन आज भी इमारत की दीवारों पर हिन्दू चिन्हि अंकित हैं. पासी समाज ने इस इमारता का ऑर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) से जांच कराने की मांग की है.
