आखिर दिक्कत क्या है? पिछड़ा आयोग को लेकर HC सख्त, 19 मई तक योगी सरकार से मांगा जवाब

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण के मुद्दे पर योगी सरकार से पिछड़ा आयोग गठन में देरी का जवाब मांगा है. हाईकोर्ट ने अवमानना याचिका पर सुनवाई करते हुए 19 मई तक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. सरकार पर न्यायालय के आदेश की अवहेलना का आरोप है, जिससे पंचायत चुनावों में कानूनी अड़चनें बढ़ सकती हैं और सरकार को राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.

सांकेतिक तस्वीर Image Credit:

उत्तर प्रदेश में प्रस्तावित पंचायत चुनाव को लेकर एक बार फिर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सख्ती दिखाई है. हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से पूछा है कि आखिर दिक्कत क्या है, अब तक पिछड़ा आयोग का गठन क्यों नहीं हुआ? हाईकोर्ट ने सुनवाई की अगली तारीख 19 मई तय करते हुए उत्तर प्रदेश सरकार की योगी सरकार को जवाब दाखिल करने को कहा है. हाईकोर्ट की इस सख्ती के चलते एक बार फिर पंचायत चुनाव में पिछड़ा वर्ग आरक्षण का कानूनी पेंच फंसता नजर आ रहा है.

लखनऊ के वकील मोतीलाल यादव की अवमानना याचिका पर सुनवाई बुधवार को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ में हुई. इसमें जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ ने राज्य सरकार से पूछा कि आखिर अब तक विशेष पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन क्यों नहीं हुआ? इसमें दिक्कत क्या है? हाईकोर्ट ने इस मामले में जवाब दाखिल करने के लिए अपर मुख्य सचिव/प्रमुख सचिव पंचायती राज अनिल कुमार को नोटिस जारी किया है और उन्हें व्यक्तिगत तौर पर हाजिर होने को कहा है.

सरकार पर अवमानना का आरोप

जस्टिस सौरभ लवानिया की एकल पीठ में वकील मोतीलाल यादव ने अपनी अवमानना याचिका में आरोप लगाया है कि 4 फरवरी 2026 की सुनवाई में ही राज्य सरकार ने कोर्ट को भरोसा दिया था कि पंचायत चुनाव से पहले पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन हो जाएगा. फिर रिपोर्ट के आधार पर ही पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू किया जाएगा. सरकार के इस आश्वासन पर कोर्ट ने याचिका का निस्तारण कर दिया था. अब उन्होंने अवमानना याचिका दाखिल करते हुए आरोप लगाया कि सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की है.

सरकार पर कार्रवाई की मांग

याचिकाकर्ता ने दाखिल अवमानना याचिका में सरकार पर अपने ही वादे का पालन नहीं करने का आरोप लगाते हुए कहा कि यह सीधे तौर पर न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आता है. इसलिए सरकार के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि संवैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय के आदेशों की गरिमा बनी रहे. याचिकाकर्ता की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 19 मई तक स्थिति स्पष्ट करने को कहा है. ऐसी स्थिति में सरकार के सामने कानूनी और राजनीतिक दोनों तरह की चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं.

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