बेनी बाबू से लेकर शिवपाल तक… सपा में कई बार हुई फूट, लेकिन अब तक नहीं टूटी पार्टी
उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी में टूट की चर्चाएं एक बार फिर तेज हैं. मंत्री ओम प्रकाश राजभर और एनडीए के सहयोगी दल लगातार दावा कर रहे हैं कि सपा के कई सांसद संपर्क में हैं, लेकिन इतिहास कुछ और कहानी कहता है. बेनी प्रसाद वर्मा की बगावत, अमर सिंह-आजम खान विवाद, कल्याण सिंह से गठजोड़ और अखिलेश-शिवपाल के खुले टकराव जैसे बड़े संकटों के बावजूद समाजवादी पार्टी कभी पूरी तरह नहीं टूटी.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में इन दिनों समाजवादी पार्टी (सपा) में टूट की खबरें चल रही हैं. इसे हवा योगी सरकार के मंत्री ओम प्रकाश राजभर दे रहे हैं. उनका दावा है कि सपा में बड़ी टूट होने वाली है. हालांकि, इतिहास देखे तो सपा में कई बार फूट हुई, लेकिन टूट कभी न हुई है. चाहे बेनी प्रसाद वर्मा की नाराजगी, चाहे अमर सिंह का प्रभाव, चाहे कल्याण सिंह से गठजोड़ का विवाद, या चाहे शिवपाल यादव और अखिलेश यादव के बीच खुला टकराव. पिछले तीन दशकों में समाजवादी पार्टी ने कई बड़े राजनीतिक झटके देखे, लेकिन हर बार पार्टी टूटने की भविष्यवाणियां गलत साबित हुईं.
पिछले दिनों सुभासपा प्रमुख और मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने दावा किया है कि समाजवादी पार्टी में टूट होने वाली है और उसके कई सांसद उनके संपर्क में हैं. इसके बाद डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और निषाद पार्टी के अध्यक्ष व मंत्री संजय निषाद ने भी दावा किया कि सपा में टूट होने वाली है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या सपा वाकई टूट सकती है, या फिर यह भी उन राजनीतिक अटकलों जैसा ही साबित होगा, जो पहले भी बार-बार लगती रही हैं?
1992 में मुलायम सिंह ने बनाई समाजवादी पार्टी
6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद देश और प्रदेश की राजनीति तेजी से बदल रही थी. जनता दल बिखर चुका था. इसी दौर में मुलायम सिंह यादव ने समाजवादी पार्टी का गठन किया. शुरुआती दौर में पार्टी के सबसे प्रभावशाली नेताओं में बेनी प्रसाद वर्मा, जनेश्वर मिश्र, आजम खान और मोहन सिंह जैसे चेहरे शामिल थे, लेकिन पार्टी के भीतर मतभेद भी उसी समय से शुरू हो गए थे.
बेनी प्रसाद वर्मा: सपा की पहली बड़ी बगावत
समाजवादी पार्टी में पहली बड़ी दरार बेनी प्रसाद वर्मा के रूप में सामने आई. कुर्मी समुदाय के बड़े नेता माने जाने वाले बेनी बाबू ने 2007 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सपा से नाता तोड़ लिया था. उन्होंने अपनी खुद की पार्टी समाजवादी क्रांति दल बनाई. 2009 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले इसका विलय कांग्रेस में कर लिया और गोंडा से सांसद बने. फिर केंद्रीय मंत्री भी बने. कांग्रेस में करीब 9 साल बिताने के बाद, मई 2016 में वह पुनः समाजवादी पार्टी में लौट आए और राजयसभा सांसद बने. मार्च 2020 में अपने निधन तक इसी पार्टी के सदस्य रहे. परिवार अभी भी सपा में है.
अमर सिंह का दौर और आंतरिक संघर्ष
2003 में मुलायम सिंह यादव तीसरी बार मुख्यमंत्री बने तो पार्टी में अमर सिंह का प्रभाव तेजी से बढ़ा. कॉरपोरेट जगत और फिल्मी दुनिया से रिश्तों के कारण अमर सिंह सपा की नई पहचान बन गए, लेकिन पार्टी के पुराने समाजवादी नेताओं को उनका बढ़ता दखल पसंद नहीं आया. इसी दौरान आजम खान और अमर सिंह के बीच टकराव खुलकर सामने आया. कई बार लगा कि पार्टी दो धड़ों में बंट जाएगी, लेकिन मुलायम सिंह ने संतुलन बनाए रखा.
पानी सिर से ऊपर जाने के बाद मई 2009 में आजम को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण 6 साल के लिए सपा से निष्कासित जरूर किया गया. हालांकि, 4 दिसंबर 2010 में उनकी वापसी हो गई थी. आजम खान की गिनती सपा के कद्दावर नेताओं में होती है. 2017 के बाद तमाम उतार-चढ़ाव और जेल यात्राओं के बाद भी आजम खान ने पार्टी नहीं छोड़ी.
कल्याण सिंह से दोस्ती और मुस्लिम वोट की नाराजगी
2009 के लोकसभा चुनाव से पहले मुलायम सिंह यादव ने पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से हाथ मिला लिया था. बाबरी मस्जिद विध्वंस के आरोपों के कारण कल्याण सिंह मुस्लिम समुदाय के बड़े हिस्से के निशाने पर थे. सपा के भीतर भी इस फैसले का विरोध हुआ. माना गया कि पार्टी का परंपरागत मुस्लिम वोट बैंक उससे दूर हो सकता है. हालांकि बाद में मुलायम सिंह ने इस फैसले पर सार्वजनिक रूप से खेद जताया और समीकरण फिर संभाल लिए गए.
2016: सपा का सबसे बड़ा पारिवारिक युद्ध
समाजवादी पार्टी के इतिहास का सबसे बड़ा संकट साल 2016 में आया. यह लड़ाई केवल राजनीतिक नहीं थी, बल्कि परिवार के भीतर की सत्ता संघर्ष बन गई थी. एक तरफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव थे, जबकि दूसरी ओर उनके चाचा शिवपाल सिंह यादव और संगठन का एक बड़ा हिस्सा दिखाई दे रहा था. टिकट वितरण से शुरू हुआ विवाद खुली जंग में बदल गया. मुलायम सिंह ने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव को उनकी कुर्सी से हटा दिया था और शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया था. इसके साथ ही अखिलेश समर्थक नेताओं को भी हटाया गया था.
तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश ने जवाबी कार्रवाई की. पार्टी कार्यालय तक पर शक्ति प्रदर्शन हुआ. स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि चुनाव आयोग तक मामला पहुंच गया. 2017 विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल था कि समाजवादी पार्टी का चुनाव चिन्ह ‘साइकिल’ किसे मिलेगा. एक तरफ मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव का दावा था, जबकि दूसरी तरफ अखिलेश यादव अपने समर्थन में विधायकों और सांसदों की ताकत दिखा रहे थे. आखिरकार चुनाव आयोग ने अखिलेश यादव गुट को असली समाजवादी पार्टी और साइकिल चुनाव चिन्ह सौंप दिया.
परिवार और पार्टी में लंबे विवाद के बाद शिवपाल यादव ने अगस्त 2018 में ‘समाजवादी सेक्युलर मोर्चा’ बनाया था. इसके बाद अक्टूबर 2018 में चुनाव आयोग द्वारा इस नई पार्टी का आधिकारिक नाम ‘प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया)’ (PSPL) रखा गया, लेकिन 2019 लोकसभा और 2022 विधानसभा चुनाव में पीएसपी का प्रभाव सीमित रहा. बाद में 2022 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने अपनी पार्टी का समाजवादी पार्टी में दोबारा विलय कर लिया. मौजूदा समय में शिवपाल यादव, सपा के राष्ट्रीय महासचिव हैं.
तो फिर सपा इतिहास क्या कहता है?
तीन दशक का इतिहास यही बताता है कि समाजवादी पार्टी में मतभेद हुए, बगावत हुई, नेता गए और नए दल भी बने, लेकिन पार्टी का मूल संगठन कभी पूरी तरह नहीं टूटा. बेनी प्रसाद वर्मा से लेकर अमर सिंह, आजम खान और शिवपाल यादव तक कई बड़े चेहरे अलग हुए या नाराज हुए, लेकिन समाजवादी पार्टी अपनी राजनीतिक पहचान बचाने में सफल रही. इसलिए 2027 से पहले एक बार फिर सपा में टूट की चर्चाएं भले तेज हों, लेकिन उत्तर प्रदेश की राजनीति का इतिहास यही कहता है कि समाजवादी पार्टी में फूट की खबरें नई नहीं हैं और अब तक हर संकट के बाद पार्टी किसी न किसी रूप में खुद को संभालने में कामयाब रही है.