श्रावस्ती एनकाउंटर की कहानी में झोल!HC ने घटनाक्रम पर उठाए सवाल, अब CBI करेगी मामले की जांच
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने श्रावस्ती एनकाउंटर में पुलिस की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं और निष्पक्ष जांच के लिए CBI को आदेश दिए हैं. कोर्ट ने पुलिस की एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम और कहानी को अविश्वसनीय माना. यह मामला चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन से जुड़ा है, जिसे सुप्रीम कोर्ट पहले ही एक अन्य मामले में बरी कर चुका था. अब सीबीआई तीन महीने में रिपोर्ट देगी.
उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती में पुलिस मुठभेड़ में घायल चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गंभीर सवाल उठाए हैं. पुलिस कार्रवाई को संदिग्ध मानते हुए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने मामले की निष्पक्ष और विस्तृत जांच के लिए CBI जांच के आदेश दिए हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस की FIR में दर्ज घटनाक्रम और जांच प्रक्रिया में संदेह पैदा होता है. मामले की अगली सुनवाई अब 23 नवंबर को होगी.
हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की अदालत ने 13 अगस्त 2026 के आदेश में CBI को जांच करने के निर्देश दिए हैं. इस आदेश के मुताबिक CBI को जांच के लिए अधिकारी नामित करना होगा और जांच रिपोर्ट प्राथमिकता के आधार पर तीन महीने के भीतर अदालत में पेश करने होंगे. वहीं मामले की अगली सुनवाई तक श्रावस्ती की अतिरिक्त सत्र अदालत द्वारा 2 जुलाई 2026 को जारी आदेश पर क्रियान्वयन पर रोक रहेगी.
क्या है पूरा मामला?
9 मई 2025 को श्रावस्ती के इकौना थाना क्षेत्र में एक सात वर्षीय बच्ची को कथित तौर पर ई-रिक्शा से ले जाने के मामले में FIR हुई थी. पुलिस ने महज एक घंटे के भीतर ही आरोपी शफीक को अरेस्ट करते हुए बच्ची को बरामद कर लिया था. बाद में चोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को इस मामले से जोड़ते हुए उसके खिलाफ 12 मई 2025 को SHO इकौना ने FIR दर्ज किया था. पुलिस का दावा था कि वह नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था. पुलिस टीम ने घेराबंदी की तो उसने फायरिंग की और जवाबी कार्रवाई में उसके पैरों में गोली लगी.
13 पुलिसकर्मी एक ही गाड़ी में कैसे?
हाईकोर्ट ने FIR के घटनाक्रम पर सवाल उठाए. पूछा कि SHO समेत 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में कैसे बैठ गए. जबकि सामान्य पुलिस जीप, SUV या MUV में 13 लोगों का बैठना व्यावहारिक नहीं है. इसी प्रकार FIR में बताया गया कि यही 13 पुलिसकर्मी तीन टीमों में बंटकर तीन अलग-अलग रास्तों पर चले गए. हाईकोर्ट ने इस कहानी को भी असंभव बताते हुए पूछा कि अगर टीम एक ही वाहन में थी तो तीन अलग-अलग दिशाओं में जाने के लिए वाहनों की व्यवस्था कहां से हुई.
23 पुलिसकर्मी, तो मुठभेड़ क्यों?
पुलिस के मुताबिक SWAT टीम के 10 जवानों समेत कुल 23 पुलिसकर्मियों ने पुल के पास घेराबंदी की थी. कोर्ट ने सवाल उठाया कि 23 पुलिसकर्मियों की मौजूदगी के बावजूद ई-रिक्शा पर सवार व्यक्ति वहां से भागने में कैसे सफल हुआ. अदालत ने इस घटनाक्रम को भी अविश्वसनीय बताया. पुलिस का दावा था कि चोटकऊ ने फायरिंग की और उसके बाद हथियार लोड करने की आवाज सुनकर SHO ने दो गोलियां चलाईं. हाईकोर्ट ने इस दावे पर भी सवाल खड़े किए.
9 MM की गोली और चोट के निशान पर सवाल
कोर्ट ने SHO से पूछा कि उन्होंने करीब 15 मीटर की दूरी से रात में केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर कैसे निशाना लगाया. SHO ने जवाब दिया कि रात में चांदनी थी. इसके बाद कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देते हुए गोली के आकार और शरीर पर मिले घावों को लेकर भी सवाल उठाए. अदालत ने SHO के स्पष्टीकरण को तर्कसंगत नहीं माना. कहा कि SHO ने FIR में और अदालत के सामने भी सही घटनाक्रम नहीं बताया और अदालत को गुमराह करने का प्रयास किया है.
पुलिसकर्मियों को मिला था इनाम
अदालत के सामने यह तथ्य भी आया कि कथित एनकाउंटर में शामिल सभी 23 पुलिस अधिकारियों-कर्मचारियों को उनके कथित अच्छे काम के लिए पुरस्कृत किया गया था. कोर्ट ने कहा कि यह कथित अच्छा काम ऐसे अपराध की स्वीकारोक्ति निकालने से भी जुड़ा था, जिसमें चोटकऊ को पहले ही सुप्रीम कोर्ट बरी कर चुका था. बता दें कि चोटकऊ पहले भी फांसी की सजा से बरी हो चुका है. उसे 2012 में एक छह वर्षीय बच्ची से जुड़े रेप और हत्या के मामले में ट्रायल कोर्ट ने दोषी ठहराकर फांसी की सजा दी थी. हाईकोर्ट ने सजा बरकरार रखी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 28 सितंबर 2022 को उसे बरी कर दिया था.
