‘मुंहबोले’ भाई उमाशंकर सिंह की कहानी, जिन्हें हर साल राखी बांधती थीं मायावती

बसपा के वरिष्ठ नेता और रसड़ा से तीन बार विधायक रहे उमाशंकर सिंह का ब्रेन कैंसर से लंबी जंग के बाद निधन हुआ. लखनऊ में बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके परिवार को हरसंभव सहयोग का भरोसा दिया. उमाशंकर सिंह को मायावती का सबसे भरोसेमंद नेता माना जाता था. 2022 विधानसभा चुनाव में बसपा की इकलौती जीत दिलाने वाले उमाशंकर सिंह ने पूर्वांचल में मजबूत राजनीतिक पहचान बनाई. उनके निधन को बसपा के लिए बड़ी राजनीतिक क्षति माना जा रहा है.

मायावती के साथ उमाशंकर सिंह Image Credit: फाइल फोटो

बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शुमार रसड़ा विधायक उमाशंकर सिंह अब इस दुनिया में नहीं रहे. ब्रेन कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में उनका निधन हो गया. गुरुवार को उनका पार्थिव शरीर लखनऊ लाया गया, जहां बसपा सुप्रीमो मायावती ने अंतिम दर्शन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी. इस दौरान मायावती बेहद भावुक नजर आईं. उन्होंने उमाशंकर सिंह के बेटे को ढांढस बंधाते हुए कहा कि पूरा बसपा परिवार उनके साथ खड़ा है.

उमाशंकर सिंह, सिर्फ बसपा के विधायक नहीं थे, बल्कि मायावती के सबसे भरोसेमंद नेताओं में शुमार थे. मायावती उन्हें अपना ‘मुंहबोला भाई’ मानती थीं और रक्षाबंधन पर वह हर साल उनसे राखी बंधवाने पहुंचते थे. बसपा की राजनीति में जब कई बड़े नेता पार्टी छोड़कर चले गए, तब भी उमाशंकर सिंह अंत तक मायावती के साथ खड़े रहे. महज 55 साल की उम्र में उमाशंकर सिंह की मौत ने सबको स्तब्ध कर दिया है.

‘उन्होंने कभी धोखा नहीं दिया’

श्रद्धांजलि देते हुए मायावती ने कहा, ‘उमाशंकर सिंह उन्हें अपनी सगी बहन की तरह मानते थे. चाहे वह लखनऊ में हों या दिल्ली में, हर रक्षाबंधन पर वह राखी बंधवाने जरूर आते थे. उन्होंने कहा कि राजनीति में कई लोगों ने उनका साथ छोड़ा, लेकिन उमाशंकर सिंह ने कभी धोखा नहीं दिया. उनका अपनापन हमेशा याद रहेगा.’ मायावती ने यह भी कहा कि यदि परिवार की इच्छा होगी तो वह उनके बेटे को राजनीति में आगे बढ़ने का पूरा अवसर देंगी.

बसपा को शून्य होने से बचाने वाले विधायक

2022 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव बसपा के इतिहास के सबसे खराब चुनावों में से एक माना जाता है. पार्टी पूरे प्रदेश में केवल एक सीट जीत सकी और वह सीट थी बलिया की रसड़ा विधानसभा, जहां से उमाशंकर सिंह लगातार तीसरी बार विधायक चुने गए. अगर उमाशंकर सिंह यह चुनाव नहीं जीतते तो विधानसभा में बसपा का खाता तक नहीं खुलता. यही वजह थी कि उन्हें पार्टी का सबसे मजबूत और सबसे भरोसेमंद चेहरा माना जाता था.

छात्र राजनीति से शुरू हुआ सफर

उमाशंकर सिंह का जन्म 2 जनवरी 1971 को बलिया जिले के खनवर गांव में हुआ था. उनके पिता घुरहू सिंह भारतीय सेना से रिटायर थे. शुरुआती शिक्षा बलिया में हुई और छात्र जीवन से ही उन्होंने राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी थी. बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में जीत के साथ उनका राजनीतिक सफर शुरू हुआ. इससे पहले वह ठेकेदारी का काम करते थे. बाद में जिला पंचायत चुनाव जीता और 2000 में बलिया के जिला पंचायत अध्यक्ष बने.

लगातार तीन बार बने विधायक

2011 में उमाशंकर सिंह ने बसपा ज्वॉइन किया था. फिर उमाशंकर सिंह पहली बार 2012 में रसड़ा विधानसभा सीट से बसपा के टिकट पर विधायक चुने गए. उस चुनाव में बसपा की सीटें भले ही 206 से घटकर 80 रह गई थीं, लेकिन उन्होंने करीब 84 हजार वोट हासिल कर समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार सनातन पांडेय को लगभग 52 हजार मतों से हराया था.इसके बाद उन्होंने 2017 और 2022 में भी लगातार जीत दर्ज की. तीन बार लगातार जीत ने साबित कर दिया कि रसड़ा क्षेत्र में उनकी व्यक्तिगत पकड़ पार्टी से कहीं अधिक मजबूत थी.

पूर्वांचल में बसपा का बड़ा चेहरा

पूर्वांचल की राजनीति में उमाशंकर सिंह की अलग पहचान थी. क्षेत्र में सड़क, शिक्षा और सामाजिक कार्यों को लेकर उनकी सक्रियता चर्चा में रहती थी. साल 2012 में उन्होंने 251 लड़कियों का सामूहिक विवाह कराया. इसके बाद 2016 में 351 हिंदू-मुस्लिम जोड़ों का सामूहिक विवाह कराकर वह पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बने. सामाजिक समरसता और जनसेवा के इन कार्यक्रमों ने उन्हें जनता के बीच अलग पहचान दिलाई. हिंदुओं को उज्जैन और मुस्लिमों को अजमेर की यात्रा कराने के कारण भी वह सुर्खियों में आए थे.

विधानसभा से ऑनलाइन जुड़े थे

पिछले कई महीनों से वह बीमार थे. बीमारी के बावजूद उमाशंकर सिंह अपनी जिम्मेदारियों को निभाते रहे. 24 फरवरी 2025 को जब उत्तर प्रदेश विधानसभा का सत्र चल रहा था, तब वह स्वास्थ्य कारणों से ऑनलाइन कार्यवाही में शामिल हुए थे. विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने विशेष अनुमति देकर उन्हें वर्चुअल रूप से अपनी बात रखने का अवसर दिया था. साथ ही पूरे सदन की ओर से उनके जल्द स्वस्थ होने की कामना भी की गई थी. उस समय उमाशंकर सिंह ने भावुक होकर विधानसभा अध्यक्ष का आभार व्यक्त किया था.

विवादों से भी रहा नाता

उमाशंकर सिंह का राजनीतिक जीवन पूरी तरह विवादों से अछूता नहीं रहा. 2017 में तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक ने चुनाव आयोग की सिफारिश पर उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त कर दी थी. उन पर जनप्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन और सरकारी ठेके अपने नाम पर लेने का आरोप लगा था. यह प्रदेश का पहला मामला था, जब किसी विधायक की सदस्यता पिछली तारीख से समाप्त की गई थी. हालांकि बाद में उन्होंने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी और सर्वोच्च अदालत से राहत मिलने के बाद उनकी सदस्यता बहाल हो गई थी.

आयकर विभाग की कार्रवाई भी हुई

फरवरी 2026 में जब वह कैंसर का इलाज करा रहे थे, उसी दौरान आयकर विभाग ने उनके कई ठिकानों पर छापेमारी की थी. हालांकि बीमारी के कारण वह सक्रिय राजनीति से काफी दूर हो चुके थे.

कारोबार की दुनिया में भी मजबूत पहचान

राजनीति के अलावा उमाशंकर सिंह सफल कारोबारी भी थे. उनकी छात्र शक्ति कंस्ट्रक्शन्स नाम की कंपनी सड़क निर्माण के क्षेत्र में काम करती थी. कंपनी ने कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट पूरे किए. इसके अलावा वह खनन, होटल और शिक्षा क्षेत्र से भी जुड़े थे. 2022 के विधानसभा चुनाव में दिए गए शपथपत्र के अनुसार उनकी कुल संपत्ति करीब 54 करोड़ रुपये थी. इसमें लगभग 18 करोड़ रुपये की चल और करीब 36 करोड़ रुपये की अचल संपत्ति शामिल थी. उन पर लगभग 13 करोड़ रुपये का कर्ज भी दर्ज था.

परिवार में कौन-कौन?

उमाशंकर सिंह अपने पीछे पत्नी पुष्पा सिंह, बेटी यामिनी और बेटे प्रिंस युकेश को छोड़ गए हैं. पुष्पा सिंह उनकी कंपनी सी.एस. इंफ्राकंस्ट्रक्शन लिमिटेड की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं, जबकि बेटे युकेश कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं. युकेश की शादी 2024 में उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री दिनेश प्रताप सिंह की भतीजी कनिका सिंह से हुई थी. इस विवाह समारोह में बसपा सुप्रीमो मायावती भी शामिल हुई थीं.

बसपा के लिए बड़ी राजनीतिक क्षति

उमाशंकर सिंह का निधन बसपा के लिए सिर्फ एक विधायक का निधन नहीं, बल्कि पार्टी के सबसे भरोसेमंद और जनाधार वाले नेताओं में से एक का जाना माना जा रहा है. जब पार्टी का राजनीतिक आधार लगातार कमजोर होता गया, तब भी रसड़ा में उन्होंने बसपा का झंडा बुलंद रखा. अब सबकी नजर इस बात पर होगी कि क्या मायावती अपने वादे के मुताबिक उनके बेटे को राजनीति में आगे बढ़ाकर उसी विरासत को आगे ले जाती हैं या नहीं.

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