फाइल देखने से किसने रोका? आकृति पर NSA लगाकर फंसी IAS मेघा रूपम, पूर्व DGP ने उठाए सवाल

नोएडा डीएम IAS मेघा रूपम पर आकृति चौधरी के खिलाफ गलत तरीके से एनएसए लगाने के आरोप में हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है. कोर्ट ने डीएम पर जुर्माना लगाया है, जिसे उनकी सैलरी से वसूला जाएगा और सेवा रिकॉर्ड में भी दर्ज होगा. पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने डीएम की जिम्मेदारी पर सवाल उठाते हुए कहा कि उन्हें फाइल की समीक्षा करनी चाहिए थी. यह मामला प्रशासनिक चूक का एक गंभीर उदाहरण है.

आकृति पर एनएसए लगाकर बुरी फंसी नोएडा डीएम Image Credit:

नोएडा में हुए लेबर प्रोटेस्ट के दौरान एनफ्लूएंसर और दिल्ली यूनिवर्सिटी की छात्रा आकृति चौधरी पर एनएसए लगाकर नोएडा की डीएम IAS मेघा रूपम बुरी तरह से फंस चुकी हैं. हाईकोर्ट ने उन्हें फटकार तो लगाया ही, उनके ऊपर जुर्माना लगाते हुए उनकी सैलरी से वसूल करने ओर उनके सर्विस रिकॉर्ड में दर्ज करने के भी आदेश दिए हैं. इस फैसले पर पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह ने गंभीर टिप्पणी की. कहा कि यह सही है कि रिपोर्ट पुलिस तैयार करती है, लेकिन अप्रूव तो डीएम ही करता है. उन्हें फाइल पढ़ने से किसने रोका था.

उन्होंने हमीरपुर में अपने कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय डीएम उनके मित्र थे, फिर भी 10 में से चार पांच फाइलों को लौटा ही देते थे. दरअसल, डीएम की यह जिम्मेदारी बनती है कि जिस व्यक्ति के खिलाफ एनएसए लगाने की संस्तुति आई है, क्या वह इसके योग्य है भी या नहीं. यदि नहीं तो वह बेझिझक फाइल को लौटा सकता है. इस मामले में नोएडा डीएम ने क्यों इन चीजों को नजरअंदाज किया, यह तो वही बता सकती हैं.

कब लगता है NSA?

पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह के मुताबिक उत्तर प्रदेश में एनएसए लगाने के लिए तीन आधार दिए वर्णित है. इसमें पहला आधार राष्ट्रीय सुरक्षा है. इसमें यदि कोई व्यक्ति राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए संवेदनशील कैंपस में घुसकर फोटो वीडियो बनाते हैं या कोई ऐसी हरकत करते हैं, जिससे देश की सुरक्षा को खतरा हो तो एनएसए की कार्रवाई हो सकती है. इसके अलावा यदि कोई आवश्यक सेवाओं में बाधा पहुंचाता है या फिर लोक व्यवस्था को ध्वस्त करता है तो भी एनएसए की कार्रवाई हो सकती है.

क्या है NSA की प्रक्रिया?

पूर्व डीजीपी के मुताबिक इन तीनों में से किसी भी आधार की आशंका होने पर पुलिस डीएम को रिपोर्ट भेज सकती है. इस रिपोर्ट में पूरा विवरण होता है, यानी पुलिस बताती है कि ये आदमी किस तरह से देश या समाज के लिए खतरा बन सकता है. इस रिपोर्ट का मूल्यांकन होता है और फिर इसकी संस्तुति डीएम को भेजी जाती है. फिर डीएम अपने विवेक के आधार पर मूल्यांकन करता है और उचित पाए जाने पर एनएसए अप्रूव करता है. उन्होंने बताया कि एनएसए लगाने के लिए डीएम ही जिम्मेदार होता है, लेकिन इसमें संबंधित कप्तान या विवेचक की भूमिका कम नहीं हो जाती.

भयावह चूक का है मामला

पूर्व डीजीपी ने बताया कि पुलिस ने लोक व्यवस्था ध्वस्त होने का प्रस्ताव प्रस्ताव बना कर भेजा होगा. अब यहां सवाल है कि विवेचक ने प्रस्ताव बनाया तो मूल्यांकन करने वाले पुलिस अधिकारी या इसे अप्रूव करने वाले डीएम ने क्यों नजरअंदाज किया. इस मामले भयावह चूक हुई है और इसके लिए हाईकोर्ट ने डीएम को दंडित किया है. इस मामले में डीएम और पुलिस कमिश्नर को सावधानी बरतनी चाहिए थी. इस मामले में एसएचओ पर भी कार्रवाई होनी चाहिए.

जल्दबाजी में लगाया एनएसए

वरिष्ठ वकील आईबी सिंह ने इस मामले को लेकर प्रशासनिक तानाशाही पर सवाल खड़े किए. उन्होंने कहा कि आकृति पर एनएसए लगाने के लिए अधिकारियों में ऐसी जल्दबाजी थी कि तथ्यों की पड़ताल तक नहीं की. उन्हें तो बस ये लग रहा थ कि कहीं इसकी जमानत ना हो जाए. चूंकि एनएसए में जमानत होती नहीं, इसलिए इस तरह का मुकदमा बना दिया.

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