रजिस्ट्रेशन अनिवार्य होने पर भी अवैध नहीं होंगी 2017 से पहले की शादियां…HC की कड़ी टिप्पणी, जानें क्या है मामला
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने आजमगढ़ के एक दंपति के तलाक मामले में महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है. हाईकोर्ट ने कहा कि विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र, विवाह की वैधता का प्रमाण नहीं है. बल्कि यह सिर्फ एक साधन है. इसी के साथ हाईकोर्ट ने कहा कि 2017 से पहले हुई शादियों को बिना पंजीकरण के अवैध नहीं माना जा सकता. उच्च न्यायालय ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द करते हुए तलाक याचिका पर विचार करने का निर्देश दिया है.

उत्तर प्रदेश में आजमगढ़ की एक दंपत्ति को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने आजमगढ़ फेमिली कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए कहा कि रिश्तों में प्रमाणपत्र अनिवार्य नहीं है. बल्कि रिश्तों की पहचान के लिए यह एक साधन भर है. हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में कोई भी प्रमाण पत्र एक साधन तो हो सकता है, लेकिन इसे कभी बाधा नहीं समझा जाना चाहिए. हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी एक तलाक अर्जी के मामले में की है.
जानकारी के मुताबिक आजमगढ़ के एक दंपत्ति ने आपसी सहमति से अलग होने का फैसला किया था. इस संबंध में दंपत्ति ने फेमिली कोर्ट में अर्जी लगाई, कहा कि उनकी शादी साल 2010 में हिन्दू रीति रिवाज से हुई थी. इस शादी का पंजीकरण नहीं कराया गया था, लेकिन अब 15 साल साथ रहने के बाद दोनों पति-पत्नी अलग होना चाहते हैं. इस मामले में फेमिली कोर्ट ने यह कहते हुए अर्जी खारिज कर दी थी कि इस शादी का कोई प्रमाणपत्र ही नहीं है.
हिंदू धर्म में एक अनुष्ठान है शादी
ऐसे में दंपत्ति ने इस मामले में हाईकोर्ट से गुहार लगाई. जहां हाईकोर्ट में न्यायमूर्ति मनीष कुमार निगम की अदालत ने अर्जी स्वीकार करते हुए अहम फैसला दिया है. हाईकोर्ट ने फेमिली कोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए तलाक की अर्जी पर गुण-दोष के आधार पर विचार करने और जल्द से जल्द मामले को निस्तारित करने का आदेश दिया है. हाईकोर्ट ने कहा कि हिन्दू धर्म में शादी एक धार्मिक अनुष्ठान है. इस लिए हिंदू विवाह की वैधता के लिए धार्मिक अनुष्ठान ही जरूरी है, ना कि विवाह प्रमाण पत्र या कोई अन्य साधन. सेसे में यदि विवाह का पंजीकरण नहीं कराया गया है तो इसे अवैध नहीं कहा जा सकता.
अवैध नहीं होंंगी पुरानी शादियां
कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में साफ तौर पर कहा कि प्रक्रिया संबंधी नियम न्याय दिलाने के लिए होते हैं. इनहें एक साधन तो कहा जा सकता है, लेकिन इसे किसी हाल में बाधा नहीं माना जा सकता. इन परिस्थितियों में तलाक की कार्रवाई के लिए विवाह का पंजीकृत होना या पंजीकरण प्रमाणपत्र पेश करना जरूरी नहीं हो सकता. कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश विवाह पंजीकरण नियम- 2017 लागू होने के बाद भले ही पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि 2017 से पहले हुए विवाह अवैध मान लिए जाएंगे.