बुलडोजर कार्रवाई पर इलाहाबाद HC में मतभेद, अब तीसरे जज की बेंच करेगी सुनवाई

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई की वैधता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की खंडपीठ के दो न्यायाधीशों के बीच मतभेद सामने आया है. हमीरपुर से जुड़े मामले में जस्टिस अतुल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन बुलडोजर कार्रवाई की प्रक्रिया और नोटिस अवधि पर एकमत नहीं हो सके. इसके बाद मामला तीसरे जज की बेंच को भेज दिया गया.

हाई कोर्ट ( फाइल फोटो)

उत्तर प्रदेश में बुलडोजर कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान दो जजों की अलग-अलग राय सामने आई है. दरअसल, हमीरपुर जिले से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की बेंच के दोनों न्यायाधीश बुलडोजर कार्रवाई की वैधता और उसके दायरे को लेकर एकमत नहीं हो सके. जस्टिस अतुल श्रीवास्तव और जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ के बीच कानूनी प्रश्नों पर मतभेद होने के बाद मामला तीसरे जज की बेंच को भेज दिया गया है.

यह मामला केवल एक व्यक्ति की संपत्ति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि प्रदेश में अपराधियों और आरोपियों के खिलाफ की जाने वाली बुलडोजर कार्रवाई की भविष्य की कानूनी रूपरेखा तय करने वाला माना जा रहा है. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि तीसरे जज का फैसला आने वाले समय में ऐसे सभी मामलों के लिए महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है.

हमीरपुर के मामले से उठा बड़ा सवाल

मामला हमीरपुर जिले में पॉक्सो एक्ट और संपत्ति हस्तांतरण से जुड़े विवाद से संबंधित है. याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट में आरोप लगाया कि प्रशासन ने उनकी संपत्तियों को सील करने और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई करते समय संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन किया. उनका कहना था कि बिना पर्याप्त नोटिस और वैधानिक प्रक्रिया पूरी किए बुलडोजर कार्रवाई की गई.

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह मूल प्रश्न आया कि क्या केवल किसी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के आधार पर उसके मकान या संपत्ति को ध्वस्त किया जा सकता है, और यदि निर्माण अवैध है तो कार्रवाई की प्रक्रिया क्या होनी चाहिए.

जस्टिस अतुल श्रीवास्तव ने क्या कहा?

खंडपीठ में शामिल जस्टिस अतुल श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट के बुलडोजर संबंधी फैसलों का हवाला देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं. उन्होंने कहा कि सिर्फ एफआईआर दर्ज हो जाने या आपराधिक मुकदमा चलने के आधार पर किसी आरोपी का मकान नहीं गिराया जा सकता. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि एफआईआर दर्ज होने के बाद कम से कम दो साल तक आरोपी का मकान न गिराया जाए, जब तक कि सार्वजनिक भूमि को तत्काल खाली कराना अत्यंत आवश्यक न हो.

जस्टिस अतुल श्रीवास्तव ने यह भी सुझाव दिया कि यदि निर्माण तीन साल या उससे अधिक पुराना है, तो ध्वस्तीकरण से पहले कम से कम एक साल का नोटिस दिया जाना चाहिए. प्रशासनिक कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 के अनुरूप होनी चाहिए, ताकि किसी नागरिक के साथ मनमानी न हो. जस्टिस श्रीवास्तव की इन टिप्पणियों को बुलडोजर कार्रवाई पर संभावित दिशानिर्देश के रूप में देखा जा रहा है.

जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने जताई असहमति

दूसरी ओर जस्टिस सिद्धार्थ नंदन ने इन सुझावों से सहमति नहीं जताई. उन्होंने माना कि अवैध निर्माण के मामलों में प्रशासन के अधिकारों को इस तरह सीमित करना उचित नहीं होगा. हालांकि विस्तृत आदेश में उनके कानूनी तर्क अलग से दर्ज किए गए हैं, लेकिन इतना स्पष्ट हो गया कि दोनों न्यायाधीश कार्रवाई की समयसीमा और नोटिस अवधि को लेकर अलग-अलग राय रखते हैं. यही कारण है कि खंडपीठ कोई साझा फैसला नहीं दे सकी और मामला तीसरे जज के पास भेजना पड़ा.

तीसरे जज की बेंच क्या तय करेगी?

अब तीसरे जज के सामने मुख्य रूप से ये सवाल होंगे कि क्या केवल आपराधिक मुकदमा दर्ज होने के आधार पर बुलडोजर कार्रवाई की जा सकती है? अवैध निर्माण पर कार्रवाई से पहले कितनी नोटिस अवधि आवश्यक होगी? क्या पुराने निर्माणों को विशेष संरक्षण मिलना चाहिए? प्रशासनिक कार्रवाई और नागरिकों के मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए? तीसरे जज का निर्णय खंडपीठ के अंतिम फैसले का आधार बनेगा.

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