शांति भंग में अवैध हिरासत पर हर रोज देना होगा 25 हजार रुपया, HC का बड़ा फैसला

उत्तर प्रदेश में शांति भंग की आशंका में की जाने वाली पुलिस कार्रवाई पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने कहा कि किसी भी नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और बिना वैध कानूनी आधार किसी को हिरासत में रखना संविधान के खिलाफ है. हाई कोर्ट ने भविष्य में अवैध हिरासत के मामलों में प्रतिदिन 25 हजार रुपये तक मुआवजा देने की बात भी कही और यह राशि दोषी पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूली जाएगी.

शांति भंग में जेल के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट का आदेश Image Credit: AI Generated

उत्तर प्रदेश में पुलिस की ओर से शांति भंग की आशंका में की जाने वाली कार्रवाई को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेहद सख्त टिप्पणी की है. अदालत ने साफ कहा है कि किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता सर्वोपरि है और बिना कानूनी आधार किसी को हिरासत में रखना संविधान के खिलाफ है. कोर्ट ने अवैध हिरासत के मामलों में न सिर्फ मुआवजे का आदेश दिया है, बल्कि यह भी कहा है कि दोषी पुलिस अधिकारियों से यह रकम वसूली जाएगी.

दरअसल, इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में उत्तर प्रदेश पुलिस को कड़ा संदेश दिया है. अदालत ने कहा कि शांति भंग की आशंका के नाम पर किसी भी नागरिक को मनमाने तरीके से हिरासत में नहीं लिया जा सकता. यदि किसी व्यक्ति को कानूनी आधार के बिना 24 घंटे से अधिक समय तक हिरासत में रखा जाता है तो यह उसके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन माना जाएगा, संविधान प्रत्येक नागरिक को व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है.

पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश

जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस संजीव कुमार की खंडपीठ ने प्रयागराज निवासी मतंबर मिश्रा को 25 हजार अंतरिम मुआवजा और 10 हजार रुपये केस खर्च देने का आदेश दिया. 6 नवंबर 2022 को पुलिस चौकी के तत्कालीन प्रभारी सूर्य प्रकाश दुबे मतंबर के घर पहुंचे और बिना कारण बताए खीचकर थाने ले गए. आरोप है कि उन्हें 24 घंटे तक लॉकअप में रखा गया और रिहाई के बदले 20 हजार रुपये मांगे. पूरी कार्रवाई भाई की बहू की घरेलू हिंसा संबंधी शिकायत के आधार पर की गई थी.

सुनवाई के दौरान दरोगा ने दावा किया कि याची स्वेच्छा से चौकी आए थे. कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी कोई आध्यात्मिक गुरु, पंच परमेश्वर या सामुदायिक नेता नहीं होता, जिसके पास लोग स्वेच्छा से पारिवारिक विवाद सुलझाने जाएं. अदालत ने यह भी माना कि बाद में याची के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 107 और 116 के तहत शुरू की गई कार्रवाई अवैध हिरासत को सही ठहराने का प्रयास किया, जो अवैध है.

हर दिन 25 हजार रुपये देंगे संबंधित अफसर

अदालत ने माना कि लगभग आठ दिनों तक हुई अवैध हिरासत नागरिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है. हाई कोर्ट ने कहा कि दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए और मुआवजे की राशि संबंधित पुलिस अधिकारियों के वेतन से वसूली जाए. अदालत ने फैसला दिया कि भविष्य में ऐसे मामलों में प्रतिदिन 25 हजार रुपये तक का मुआवजा देना होगा. अगर किसी व्यक्ति को गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखा जाता है तो इसका मुआवजा संबंधित अधिकारियों को देना होगा.

कानून के दायरे में करनी होगी कार्रवाई

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस का कर्तव्य है, लेकिन यह अधिकार असीमित नहीं है. पुलिस को हर कार्रवाई कानून के दायरे में रहकर करनी होगी. कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी नागरिक की स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला हर निर्णय उचित कारणों, पर्याप्त साक्ष्यों और वैधानिक प्रक्रिया पर आधारित होना चाहिए. केवल आशंका या सामान्य आरोप के आधार पर किसी को जेल भेजना स्वीकार्य नहीं हो सकता.

प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को निर्देश

अदालत ने प्रयागराज पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया है कि आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करें और निर्धारित समय सीमा के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें. माना जा रहा है कि इस फैसले के बाद पूरे प्रदेश में पुलिस अधिकारियों को शांति भंग और निरोधात्मक कार्रवाई से जुड़े मामलों में अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी.

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