सहारनपुर: कलेक्ट्रेट मस्जिद मामले में जिला जज ने भी नहीं दी राहत, बेदखली का आदेश बरकरार
सहारनपुर कलेक्ट्रेट मस्जिद मामले में जिला जज ने मस्जिद कमेटी की अपील खारिज कर दी है. सिटी मजिस्ट्रेट के 30 दिन में बेदखली आदेश को बरकरार रखा है. यह मामला सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे से जुड़ा है. अब मस्जिद कमेटी फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देने की तैयारी में है.
सहारनपुर के बहुचर्चित कलेक्ट्रेट मस्जिद प्रकरण में जिला जज की अदालत से भी राहत नहीं मिली है. गुरुवार को जिला जज ने मस्जिद कमेटी की ओर से दाखिल अपील को खारिज कर दिया. अदालत ने सिटी मजिस्ट्रेट की ओर से पारित आदेश को बरकरार रखा है. जिला अदालत के इस फैसले के बाद मामले में मस्जिद पक्ष को बड़ा झटका लगा है.
पूरा विवाद कलेक्ट्रेट परिसर स्थित मस्जिद की जमीन और उसके निर्माण की वैधता को लेकर है. प्रशासन का कहना है कि यह जमीन सरकारी है और उसपर अवैध निर्माण किया गया. सिटी मजिस्ट्रेट ने 16 जुलाई 2026 को विवादित परिसर खाली करने के लिए 30 दिन का समय दिया था. अब जिला अदालत के फैसले पर मस्जिद कमेटी हाईकोर्ट का रूख करेगी.
6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का भी मामला
कलेक्ट्रेट मस्जिद का विवाद 2024-25 में उस समय सामने आया, जब बजरंग दल के पूर्व प्रांत संयोजक विकास त्यागी की ओर से शिकायत की गई. आरोप लगाया गया कि कलेक्ट्रेट परिसर की सरकारी जमीन पर अवैध रूप से मस्जिद का निर्माण किया गया है. इसके बाद प्रशासन ने राजस्व अभिलेखों और अन्य दस्तावेजों की जांच शुरू की.
मामला उत्तर प्रदेश सार्वजनिक परिसर (अनधिकृत अधिभोगियों की बेदखली) अधिनियम के तहत सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत पहुंचा. संबंधित भूमि को राजस्व अभिलेखों में कलेक्ट्रेट-कचहरी परिसर की सरकारी भूमि के रूप में दर्ज बताया गया. विवादित जमीन खसरा संख्या 539 से जुड़ी बताई गई है, जिसका क्षेत्रफल करीब 315 वर्ग मीटर है.
लंबी सुनवाई के बाद 16 जुलाई 2026 को सिटी मजिस्ट्रेट कुलदीप सिंह की अदालत ने अपना फैसला सुनाया. अदालत ने 30 दिन के भीतर परिसर खाली करने का आदेश दिया. साथ ही सरकारी भूमि के कथित अनधिकृत कब्जे और उपयोग के एवज में करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति तय की और कब्जा नहीं हटाने पर बेदखली की कार्रवाई के आदेश दिए थे.
मस्जिद पक्ष ने पुराने दस्तावेजों का दिया था हवाला
सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के खिलाफ मस्जिद कमेटी ने जिला जज की अदालत में अपील दाखिल की थी. मस्जिद पक्ष की ओर से दलील दी गई कि निचली अदालत ने मामले से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेजों और तथ्यों पर पर्याप्त विचार नहीं किया. मस्जिद लंबे समय से मौजूद है, इसे केवल सरकारी जमीन पर नया अवैध निर्माण बताकर हटाया नहीं जा सकता.
मस्जिद पक्ष ने 1911 से चले आ रहे बिजली कनेक्शन, नगर निगम के रिकॉर्ड में कलेक्ट्रेट और मस्जिद के अलग-अलग असेसमेंट, पुराने राजस्व अभिलेखों और डाकघर से जुड़े दस्तावेजों को महत्वपूर्ण साक्ष्य बताया था. अपील की सुनवाई के दौरान कुछ अतिरिक्त दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर लेने की मांग भी की थी. इनपर भी दोनों पक्षों के बीच अदालत में बहस हुई थी.
वहीं प्रशासन ने सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश को सही बताते हुए अपील खारिज करने की मांग की. कहा कि राजस्व अभिलेखों में संबंधित जमीन सरकारी भूमि के रूप में दर्ज है और उपलब्ध रिकॉर्ड में इसे वक्फ या धार्मिक स्थल के रूप में दर्ज किए जाने का आधार नहीं मिला. मस्जिद पक्ष ने भी अपने दावे के समर्थन में पर्याप्त संबंधी दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सके.
कुछ कमरों के इस्तेमाल का मुद्दा भी सामने आया
इस विवाद में कलेक्ट्रेट परिसर के उसी भवन में डाकघर के संचालन और कुछ कमरों के इस्तेमाल का मुद्दा भी सुनवाई के दौरान सामने आया. प्रशासन का आरोप रहा कि सरकारी परिसर के हिस्सों का उपयोग किया गया और कुछ कमरों से किराया भी लिया जाता रहा. यही तथ्य सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश में भी चर्चा का हिस्सा बने थे.
बाद में सिटी मजिस्ट्रेट के आदेश के चलते डाकघर को भी वैकल्पिक स्थान पर शिफ्ट करने की कवायद शुरू हुई थी, क्योंकि वहां बड़ी संख्या में लोग डाक और बैंकिंग सेवाओं के लिए पहुंचते हैं. अब जिला जज की अदालत से भी मस्जिद कमेटी को राहत नहीं मिली है. अब मस्जिद कमेटी के सामने अगला कानूनी रास्ता इलाहाबाद हाईकोर्ट का है.
