बचपन में जितेंद्र ने गंवा दिया था पैर, दूसरों को खेलते देख छलकते थे आंसू…आज पावरलिफ्टिंग में नेशनल चैंपियन

सहारनपुर के जितेंद्र कुमार जब मात्र ढाई साल के थे तभी एक दर्दनाक हादसे के चलते उनका एक पैर काटना पड़ा. अपने उम्र के बच्चों जैसे जब वह दूसरे बच्चों को दौड़ते,खेलते और मस्ती करते देखते थे तो उनका मन दुखी हो जाता. लेकिन जितेंद्र ने कभी हार नहीं मानी. आज वह अपनी मेहनत और हौसले की बदौलत पावर लिफ्टिंग में नेशनल चैंपियन हैं.

पावर लिफ्टिंग के नेशनल चैंपियन जितेंद्र कुमार

अगर इंसान के इरादे मजबूत हों तो कोई भी मुश्किल उसे मंजिल तक पहुंचने से नहीं रोक सकती. सहारनपुर के छोटे से गांव गोविंदपुर निवासी जितेंद्र कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. बचपन में एक हादसे में अपना एक पैर गंवाने वाले जितेंद्र ने जिंदगी से हार मानने के बजाय संघर्ष को अपनी ताकत बनाया और आज नेशनल स्तर के पावरलिफ्टर बनकर हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गए हैं.

ढाई साल की उम्र में काटना पड़ा था एक पैर

जितेंद्र कुमार जब मात्र ढाई साल के थे, तभी एक दर्दनाक हादसे ने उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. ट्रक की चपेट में आने से उनके पैर में गंभीर चोट आई. इलाज के दौरान पैर में इंफेक्शन फैल गया और डॉक्टरों को उनका एक पैर काटना पड़ा. इस हादसे ने पूरे परिवार को झकझोर दिया, लेकिन माता-पिता ने बेटे का हौसला कभी टूटने नहीं दिया.

हमउम्र बच्चों के साथ ना खेल पाने से दुखी हो जाते थे

जितेंद्र बताते हैं कि बचपन उनके लिए आसान नहीं था. जब वह दूसरे बच्चों को दौड़ते, खेलते और मस्ती करते देखते थे तो कई बार मन बहुत दुखी हो जाता था. उन्हें लगता था कि वह शायद कभी सामान्य जिंदगी नहीं जी पाएंगे. कई बार आंखें भी नम हो जाती थीं, लेकिन उन्होंने खुद को कमजोर नहीं पड़ने दिया. उन्होंने तय कर लिया था कि जिंदगी में कुछ अलग करके दिखाना है.

जितेंद्र ने कभी खुद को कमजोर नहीं होने दिया

शारीरिक कमजोरी के बावजूद जितेंद्र ने कभी खुद को दूसरों पर बोझ नहीं बनने दिया. उन्होंने एक पैर से साइकिल चलाना सीखा. गांव में खेतों से घास लाने जैसे काम भी किए. धीरे-धीरे उन्होंने खुद को मानसिक रूप से इतना मजबूत बना लिया कि हर मुश्किल उनके सामने छोटी लगने लगी.

पढ़ाई और नौकरी जारी रखी

संघर्षों के बीच जितेंद्र ने अपनी पढ़ाई जारी रखी. उन्होंने BA की पढ़ाई पूरी की और बाद में हैदराबाद के एक कॉलेज से फॉरेन लैंग्वेज का कोर्स किया. मेहनत और लगन के दम पर आज वह अमेजन कंपनी में नौकरी कर रहे हैं. कोविड काल से वह वर्क फ्रॉम होम के जरिए अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे हैं.

कोरोना काल में जिम जाना शुरू किया

कोरोना काल में जब लोग घरों में बंद थे, उसी दौरान जितेंद्र ने खुद को फिट रखने के लिए जिम जाना शुरू किया. जिम में उनके साथियों ने उन्हें लगातार मोटिवेट किया. वहीं से उन्होंने पावरलिफ्टिंग में कदम रखा. मेहनत, अनुशासन और मजबूत इरादों के दम पर महज तीन साल में उन्होंने कई बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लीं .

तीन साल के अंदर ही जीत लिए कई सारे मेडल

आज जितेंद्र कई बार स्टेट और नेशनल स्तर की प्रतियोगिताओं में पदक जीत चुके हैं. उन्होंने ‘खेलो इंडिया’ में भी मेडल हासिल किया है. अब वह आने वाली प्रतियोगिताओं की तैयारी में जुटे हुए हैं. उनका सपना देश के लिए ओलंपिक में खेलना है और इसके लिए वह लगातार कड़ी मेहनत कर रहे हैं.

जिम में आने वाले लोग जितेंद्र से लेते हैं प्रेरणा

जिम में उनके साथ अभ्यास करने वाले साथी बताते हैं कि जितेंद्र को देखकर उन्हें भी जिंदगी में आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है. उनका संघर्ष यह सिखाता है कि अगर इंसान के अंदर जुनून हो तो कोई भी कमी उसे सफल होने से नहीं रोक सकती. खुद जितेंद्र का कहना है कि शरीर का एक अंग खराब हो जाने के बाद कई लोग निराश हो जाते हैं, लेकिन जिंदगी में कभी हार नहीं माननी चाहिए. उनका मानना है कि जिंदगी सिर्फ एक बार मिलती है और इसे पूरी हिम्मत और मेहनत के साथ जीना चाहिए.

आज गोविंदपुर का यह बेटा उन तमाम लोगों के लिए मिसाल बन चुका है जो छोटी-छोटी परेशानियों में हार मान लेते हैं. एक पैर गंवाने के बाद भी जितेंद्र कुमार ने जिस तरह अपने हौसले और मेहनत से नेशनल स्तर तक का सफर तय किया, वह सच में संघर्ष, साहस और आत्मविश्वास की अनोखी कहानी है.

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