मानसून से पहले यहां क्यों पसीजने लगते हैं पत्थर? हैरान कर देंगे ये रहस्य, देखकर बारिश का आंकलन करते हैं लोग
सोनभद्र में आदिवासी समुदाय सदियों से पत्थरों को देखकर मानसून का सटीक आकलन करता है. रासपहरी और मुरगुड़ी पहाड़ियों पर विशाल पत्थरों की सतह पर नमी उभरने को वे "पत्थरों का पसीजना" कहते हैं, जो अच्छी वर्षा का प्राकृतिक संकेत है. वैज्ञानिक इसे बढ़ती आर्द्रता के कारण संघनन मानते हैं, पर इस प्राचीन ज्ञान पर विस्तृत शोध की आवश्यकता है. यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से संरक्षित है.
वैसे तो विज्ञान काफी आगे निकल चुका है, लेकिन अभी दुनिया में कई ऐसे रहस्य छिपे हैं, जिनके बारे में विज्ञान हैरान है. ऐसे ही कुछ रहस्य सोनभद्र में म्योरपुर क्षेत्र में देखे जा सकते हैं. यहां आज भी आदिवासी समुदाय के लोग प्रकृति के संकेतों के आधार पर मानसून का सटीक आंकलन करते हैं. यहां लोग मौसम का आंकलन म्योरपुर ब्लॉक के रासपहरी और मधुबन की मुरगुड़ी पहाड़ियों को देखकर करते हैं. यहां स्थित प्राचीन मेगालिथ (महापाषाण) स्थल से जुड़ी एक अनोखी परंपरा इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई हैं.
स्थानीय लोगों का दावा है कि बारिश आने से पहले यहां मौजूद विशाल पत्थरों की सतह पर नमी उभरने लगती है. इसे ग्रामीण भाषा में “पत्थरों का पसीजना” कहा जाता है. उनका मानना है कि यह अच्छी वर्षा का प्राकृतिक संकेत है. स्थानीय आदिवासी बुजुर्ग रामवृक्ष गोंड के मुताबिक उन्होंने बचपन से ही अपने पूर्वजों को इन पत्थरों के व्यवहार को देखकर मौसम का अनुमान लगाते देखा है. उनके अनुसार मानसून आने से कुछ दिन पहले सुबह के समय इन पत्थरों की सतह पर बेहद महीन जल-बूंदें दिखाई देने लगती हैं. पत्थरों पर जमी काई में नमी बढ़ जाती है और उनका रंग भी सामान्य दिनों की अपेक्षा कुछ गहरा नजर आने लगता है.
अच्छी बारिश के संकेत
ग्रामीणों का कहना है कि जब भी ऐसा परिवर्तन दिखाई देता है, कुछ ही दिनों के भीतर क्षेत्र में अच्छी बारिश होती है. यही कारण है कि आज भी कई लोग खेती-किसानी और अन्य कार्यों की योजना बनाते समय इस पारंपरिक संकेतों पर भरोसा करते हैं. आदिवासी समाज का यह ज्ञान किसी पुस्तक या लिखित दस्तावेज में नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के रूप में संरक्षित रहा है. बुजुर्ग अपने अनुभव युवा पीढ़ी को बताते हैं और यही ज्ञान वर्षों से समुदाय की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बना हुआ है.
क्या कहते हैं वैज्ञानिक
इस लोक विश्वास को वैज्ञानिक दृष्टि से भी पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता. भू-विज्ञान विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून से पहले वातावरण में आर्द्रता (ह्यूमिडिटी) बढ़ने लगती है. यदि किसी क्षेत्र की चट्टानों की संरचना, तापमान और स्थानीय सूक्ष्म जलवायु अनुकूल हो, तो उनकी सतह पर संघनन (कंडेनसेशन) की प्रक्रिया के कारण नमी की बूंदें उभर सकती हैं. काई में नमी बढ़ना और पत्थरों के रंग में परिवर्तन भी इसी प्रक्रिया का परिणाम हो सकता है. हालांकि वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि इस पर अभी व्यापक और व्यवस्थित शोध की आवश्यकता है.