महिलाओं की प्रगति में बाधक ब्राह्मणवादी पितृसत्ता! BHU में MA के क्वेश्चन पेपर में आया सवाल, क्यों मचा हड़कंप?
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के MA इतिहास प्रश्नपत्र में 'क्या ब्राह्मणवादी पितृसत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली?' सवाल पर विवाद खड़ा हो गया है. अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ने आपत्ति जताई है, जबकि BHU विभाग ने इसे अकादमिक चर्चा का हिस्सा बताया है. यह प्रश्न प्राचीन भारत में महिला अधिकारों और पितृसत्तात्मक संरचनाओं पर महत्वपूर्ण बहस छेड़ता है.
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के एमए(हिस्ट्री )फोर्थ सेमेस्टर एग्जाम में पूछे गए एक सवाल पर इस समय काफी बवाल मचा है. प्राचीन इतिहास के प्रश्नपत्र में यह सवाल है कि ‘क्या ब्राह्मणवादी पितृ सत्ता ने प्राचीन भारत में महिलाओं की प्रगति में बाधा डाली’? इस सवाल पर अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा ने आपत्ति की है. हालांकि इस आपत्ति को बीएचयू के प्राचीन इतिहास विभाग ने खारिज किया है. विभाग की सीनियर प्रोफेसर और सोशल साइंस फैकल्टी की पूर्व डीन बिन्दा परांजपे ने कहा कि इस सवाल से कोई समस्या नहीं है.
उन्होंने कहा कि जिन्हें ब्राह्मण और ब्राह्मण वाद में अंतर ही नहीं पता वही ऐसे सवालों का विरोध कर सकते हैं. उन्होंने कहा कि यह सवाल सिलेबस का हिस्सा है. उन्होंने इस सवाल पर सवाल उठाने वालों की मानसिकता पर ही सवाल उठाया. कहा कि ना तो उनका कोई अध्ययन है और ना ही कोई अकादमिक बैकग्राउंड. सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है. उन्होंने कहा कि बीएचयू के काशी विश्वनाथ मंदिर में एनी बेसेंट की तस्वीर लगी है. काशी के ब्राह्मणों ने विधवा विवाह का समर्थन किया था, उसी काशी में अगर इस सवाल पर विरोध हो तो इसका उन्हें दुःख है.
लंबे संघर्ष से गुजरी महिलाएं
बिन्दा परांजपे ने कहा कि करीब चार हज़ार साल के इतिहास में वैदिक पीरियड से लेकर अब तक महिलाओं को लंबे संघर्ष से गुजरना पड़ा है. अपाला, घोषा और गार्गी से लेकर मीरा बाई, सावित्री बाई फूले और रमाबाई राना डे तक यह एक लंबी श्रृंखला है. लेकिन इन महिलाओं को भी किसी ना किसी पुरुष का समर्थन मिला था. रमाबाई बिना महागोविन्द राना डे के और सावित्री बाई फूले बिना ज्योतिबा के क्या अपना लक्ष्य हासिल कर सकते थे? महागोविन्द राना डे तो ख़ुद ही चितपावन ब्राह्मण थे. इसलिए ये समझना जरूरी है कि ब्राह्मणवाद मानसिकता गैर ब्राह्मण वर्णो में भी हो सकती है.
ब्राह्मण महासभा ने खोला मोर्चा
इस सवाल को लेकर ब्राह्मण महासभा ने मोर्चा खोल दिया है. अखिल भारतीय ब्राह्मण महासभा के अध्यक्ष राजेंद्र त्रिपाठी ने आपत्ति जताई है. कहा कि पुरातन सनातनी पितृसत्तात्मक व्यवस्था पर सवाल उठाने वाले समय के साथ आज जो व्यवस्था बनाना चाहें बनाएं, उन्हें रोकता कौन है? रही नारी के उत्थान में बाधा की बात तो, यह उस समय के संस्कारों के अनुरूप थी,जब नारियों की पूजा होती थी. यह हमारी सामाजिक व्यवस्था आजतक कायम है और नारियों के विकास में कहीं भी बाधा नहीं बनी है.
परिस्थिति के मुताबिक बनती है व्यवस्था
उन्होंने कहा कि कोई भी नियम तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार बनता हैं. अगर लगता है कि यह व्यवस्था बदली जानी चाहिए तो बदले, लेकिन ब्राह्मणवादी व्यवस्था बताकर नारियों के उत्थान में बाधा बताना, सनातनी व्यवस्था के प्रति पनप रहे पूर्वाग्रह का परिचायक मात्र है. आज जब नारियों को कोई अधिकार दिया जा रहा है, संपत्ति का अधिकार, नौकरी पेशा व्यापार का अधिकार आदि तो कोई ब्राह्मणवादी व्यवस्था इसका विरोध भी तो नहीं करता. व्यावहारिक व्यवस्था जो बनी, चली, कायम रही. उसको दोषी न बताकर उसमें आज के परिप्रेक्ष में सुधार को प्रश्रय दिया जाना चाहिए.