कचौड़ी गली सुन कईले बलमू… 95 साल पुराना गीत अब क्यों हुआ वायरल, स्वतंत्रता आंदोलन से कनेक्शन
"मिर्ज़ापुर कइले गुलजार हो कचौड़ी गली सुन कइले बलमू..." गीत इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है. 1940 के दशक का यह मशहूर कजरी गीत स्वतंत्रता संग्राम से गहरा जुड़ा है. तवायफ गौहर जान ने अपने क्रांतिकारी प्रेमी की विरह में इसे गाया था, जिन्हें अंग्रेजों ने मिर्ज़ापुर जेल में बंद कर बाद में रंगून भेज दिया था. यह गीत उनके दर्द और देश प्रेम को दर्शाता है.
मिर्जापुर कइले गुलजार हो कचौड़ी गली सून कइले बलमू… भोजपुरी का यह गीत 1940 के दशक में सुर्खियों में था. बाद में यह मुख्य कजरी गीत बना और खासतौर पर सावन के महीने में झूला झूलते हुए यह गीत खूब गाया गया. फिर इस गीत को लोक गायिका मालिनी अवस्थी ने अपना सुर दिया. लेकिन इस समय इस गीत के छोटे छोटे अंश अचानक रील के रूप में सोशल मीडिया में वायरल होने लगे हैं. लोग बाग इस गीत को बड़े मजे लेकर गुनगुना भी रहे हैं. ऐसे में यह सही मौका है कि इस गीत का गौरवशाली इतिहास भी जान लिया जाए.
आगे बढ़ने से पहले यह जान लेते हैं कि अचानक यह गीत क्यों वायरल हो रहा है. दरअसल तीन दिन पहले बॉलीवुड की प्रख्यात पार्श्व गायिका रेखा भारद्वाज ने इसी गाने पर मुंबई के कोक स्टूडियो में वीडियो शूट किया है. उन्होंने खुद इस वीडियो को छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर रील के रूप में सोशल मीडिया में शेयर किया है. इससे यह रील उनके फॉलोवर और फिर अन्य लोगों तक पहुंचा है और लोग बड़े चाव लेकर इसे गुनगुना रहे हैं. खासतौर महिलाओं को यह गीत गाते और गुनगुनाते खूब सुना जा रहा है.
स्वतंत्रता आंदोलन से क्या कनेक्शन?
अब इस गीत के इतिहास की बात कर लेते हैं. 1930-40 के दशक में बनारस में एक तवायफ हुआ करती थीं गौहर जान. बनारस ही नहीं, आसपास के इलाकों में उनका खूब नाम था और रोजाना उनका मुजरा सुनने के लिए काफी लोग पहुंचते थे. हालांकि वह एक ऐसे व्यक्ति को प्यार करती थीं, जो गर्म दल के स्वतंत्रता सेनानी थे. 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अंग्रेजों ने उन्हें अरेस्ट कर मिर्जापुर की जेल में डाल दिया था. उनके ही विरह में गौहर जान ने इस गीत का मुखड़ा ‘मिर्ज़ापुर कइलन गुलजा हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू…’ गाया था.
गीत में छलका गौहर जान का दर्द
तभी अंग्रेज सरकार ने गौहर जान के प्रेमी को वर्मा भेज दिया. यह खबर मिली तो गौहर जान विरह में बावली हो गईं. इसी विरह में उन्होंने अंतरा ‘पिया चलि गइले रंगून हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू…’ गाया. वहीं जब उनके प्रेमी को वर्मा के रंगून में फांसी हुई तो बदले की इच्छा व्यक्त करते हुए गौहर जान ने गाया कि ‘हथवा में होती जो हमरे कटरिया, बहा देईत गोरवन के खून होऽ… कचौड़ी गली सून कइले बलमू.’
कलेजा चीर देने वाली थी शहनाई की धुन
एक बार इसी गीत को शास्त्रीय गायिका डॉ.सोमा घोष ने मुंबई में गाया था. उनके साथ भारतरत्न स्व.उस्ताद बिस्मिल्लाह खां संगत कर रहे थे. उन्होंने इस गीत पर अपनी शहनाई से ऐसा करुण सुर निकाला कि मानों कलेजा ही चीरकर रख दिया हो. उसके बाद तो यह गीत अलग अलग कलाकारों ने अपने अपने अंदाज में पेश किया और फिर यह गीत कजरी विधा की मुख्य गीत बन गई. सावन के महीने में यह गीत आज भी गाहे बगाहे सुनने को मिल जाती है.
कौन थीं गौहर जान?
बनारस की प्रसिद्ध तवायफ गौहर जान के नाना अंग्रेज थे और नानी हिंदुस्तानी. वहीं उनके पिता आर्मीनियाई नागरिक थे. गौहर जान का जन्म बनारस के कचौड़ी गली में हुआ और वह पूरे जीवन बनारस में ही रहीं. उनके जमाने में संगीत की कोई लाइव स्ट्रीमिंग तो होती नहीं थी, गीत सुनने के लिए मुजरा ही एक मात्र जरिया था. उन दिनों में गौहर जान देश की पहली महिला सुपरस्टार थीं, जिन्होंने ग्रामोफोन पर अपने गायन का रिकॉर्ड बनाया था. उनके गाए कई अन्य गीत जैसे ‘सावनवा में ना जइबो ननदी…’आज भी गुनगुनाए जाते हैं.
