यहां गिरी सती की आंख, मां ने अपने हाथों से कराया था वेद व्यास को भोजन; काशी की विशालाक्षी महारानी की कहानी

काशी में विराजमान मां विशालाक्षी के मंदिर में नवरात्र के पहले दिन सुबह से ही भारी भीड़ है. यह स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक है, जहां मां सती की आंख गिरी थी. मान्यता है कि देवी यहां बाबा विश्वनाथ की अर्धांगिनी और अन्नपूर्णा के रूप में विराजित हैं. स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक माता ने यहीं पर भगवान वेद व्यास को स्वयं अपने हाथों से भोजन कराया था.

मां विशालाक्षी मंदिर

चैत्र नवरात्रि शुरू हो चुकी है. पहले पहले दिन माता शैलपुत्री का दिन है. माता एक रूप में विशालाक्षी का भी है. इस रूप में माता काशी में विश्वनाथ मंदिर के निकट विराजमान है. पौराणिक मान्यता के अनुसार इसी स्थान पर माता सती की आंख गिरी थी. इसी लिए इस 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है. स्कंद पुराण के मुताबिक माता का यह स्वरुप गृहणी का है. द्वापर युग के आखिरी चरण में जब भगवान वेद व्यास यहां भ्रमण करते समय भूख से व्याकुल हो गए तो मां विशालाक्षी ने उन्हें अपने हाथों से भोग कराया था.
आइए, आज नवरात्र के पहले दिन मां विशालाक्षी की कहानी बताते हैं. अलग अलग ग्रंथों में इस मंदिर को लेकर अलग अलग मान्यता हैं. कहीं दावा किया गया है कि इस स्थान पर माता सती के दाहिने कान का कुंडल गिरा था, वहीं कुछ लोग इस स्थान पर माता की आंख गिरने की पुष्टि करते हैं. इसी मान्यता को ज्यादा स्वीकार भी किया गया है. विभिन्न पौराणिक कथाओं के अनुसार मां भगवती अपने विशालाक्षी स्वरुप में यहां बाबा विश्वनाथ की अर्धांगिनी के रूप में विराजित है. कहा जाता है कि बाबा भले ही पूरे दिन अपने मंदिर में प्रवास करते हैं, लेकिन वह रात्रि विश्राम इसी मंदिर में करते हैं.
आदि शंकराचार्य ने कराई प्रतिष्ठा
इस समय विशालाक्षी मंदिर में आप मां भगवती के दो विग्रह देख सकते हैं. कहा जाता है कि इस समय जिस विग्रह के दर्शन होते हैं, उसकी प्रतिष्ठा जगदगुरु आदि शंकराचार्य ने कराई थी. इसके पीछे भी रोचक कहानी है. दरअसल, इस विग्रह के ठीक पीछे मां आदि शक्ति की दिव्य प्रतिमा है. इस प्रतिमा के आगे एक श्रीयंत्र विराजमान था. माता के विग्रह और इस श्रीयंत्र का तेज इतना था कि किसी की नजर नहीं टिकती थी. ऐसे में शंकराचार्य ने श्रीयंत्र के ऊपर ही माता की नई मूर्ति स्थापित करा दी.
ये मंदिर की खासियत
माता विशालाक्षी के मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के ऊपर एक गोपुरम बना है. वहीं मंदिर में शिव लिंगम है. इसके अलावा नाग और भगवान गणेश का भी विग्रह है. फिर गर्भगृह के पीछे की ओर आदि शंकराचार्य विराजमान हैं. इस मंदिर में शंकराचार्य के हाथों विराजित एक श्रीयंत्रम भी है. मान्यता है कि इसकी कुमकुम अर्चना बहुत शुभ होती है. इस मंदिर की कहानी स्कंद पुराण में भी मिलती है. कथा है कि एक बार भगवान वेद व्यास काशी भ्रमण के लिए आए थे. यहां जब वह भूख से व्याकुल हो गए तो माता ने खुद अपने हाथों से प्रसाद भोग कराया था. इसलिए मां विशालाक्षी को देवी अन्नपूर्णा के रूप में भी पूजा जाता है.

Follow Us