बीजेपी को चंद्रगुप्त विक्रमादित्य क्यों याद आए? वाराणसी में ‘महानाट्य’ के क्या हैं मायने, इतिहासकारों से समझें
बीजेपी चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को वाराणसी में 'महानाट्य' के जरिए जन-जन तक पहुंचा रही है. यह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बढ़ावा देने, वामपंथी इतिहास लेखन को चुनौती देने का प्रयास है. वहीं, इसपर राजनीति भी तेज है. जानें इतिहासकार इसको किस नजरिये से देख रहे हैं.
गुप्त साम्राज्य के चंद्रगुप्त विक्रमादित्य को भारतीय जनमानस में हमेशा से एक न्यायप्रिय और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रतीक के तौर पर याद किया जाता है.उनकी लोकप्रियता का आलम आज के दौर में भी कम नहीं हुआ है. कहते हैं कि सन 1985 में जब दूरदर्शन पर सिंहासन बत्तीसी और विक्रम -बेताल जैसे सीरियल शुरू हुए तब सड़कों पर सन्नाटा पसर जाता था. बीजेपी अब प्राचीन इतिहास के इसी महान शासक को अपने नायक के तौर पर सामने लाने की कोशिश में है.
इसकी शुरुआत पीएम के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से की गई है. बीते शुक्रवार को तीन दिवसीय महानाट्य “सम्राट विक्रमादित्य” का जीवंत मंचन बीएलडब्ल्यू के विशाल ग्राउंड पर हुआ. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और मध्य प्रदेश के सीएम डॉ. मोहन यादव ने इसका शुभारंभ किया. इसके तहत विक्रमादित्य के सुशासन और न्यायप्रियता को जन-जन तक पहुंचाई जाएगी.
बीजेपी को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की याद क्यों आई?
विक्रमोत्सव-2026 के तहत उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य के महानाट्य में 225 से ज्यादा कलाकार हाथी, घोड़े, रथ, पालकियां, भव्य युद्ध, लाइट शो, आतिशबाजी नृत्य और बाबा महाकाल की भस्म आरती की दिव्य झलकियां शामिल रही. विक्रमादित्य के जन्म से राजतिलक तक की गाथा, विक्रम बेताल की कथा और सनातन धर्म के उत्थान की महा काव्य कथा प्रस्तुत हुईं.
अब सवाल उठता है कि बीजेपी को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की याद क्यों आई? इतिहासकार इसको अपने-अपने नजरिये से देख रहे हैं. बीएचयू के प्राचीन इतिहास विभाग में प्रोफेसर वृंदा परांजपे से हमने ये सवाल किया कि: वाराणसी में विक्रमादित्य के शौर्य गाथा पर आधारित इस महानाट्य के मंचन को आप कैसे देख रही हैं?
प्रोफेसर वृंदा कहती हैं कि ये पहली बार नहीं है कि इतिहास के पन्नों से ये शासकों को सामने ला रहे हैं. इसके पहले 2019 में अमित शाह जी ने स्कन्द गुप्त की वीरता का बखान और उनकी शौर्य गाथा का महिमा मंडन किया था. हूणों पर नियंत्रण रखने वाले एक हूण नियंता शासक के तौर पर उनका यशगान किया था. इस बार चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य को ये सामने लेकर आए हैं.
वर्तमान सरकार की नीति और एप्रोच विक्रमादित्य जैसी
प्रोफेसर वृंदा ने कहा कि मुझे लगता है कि वर्तमान सरकार की जो नीति है घर में घुसकर मारने की जो उरी और ऑपरेशन सिन्दूर में दिखा, वो नीति और एप्रोच विक्रमादित्य की भी रही है. विशाख दत्त ने देवी चंद्रगुप्तम नाटक में ये वर्णन किया है कि विक्रमादित्य के बड़े भाई रामगुप्त ने शकों से जो अपमानजनक संधि की थी उससे विक्रमादित्य आहत थें और वेश बदलकर वो शकों के कैंप में घुसकर शक शासक का वध करते हैं.
विक्रमादित्य का ये घर में घुसकर मारने का अप्रोच वर्तमान शासन को सूट करता है. और शकों का निवास स्थान भी पाकिस्तान -अफगानिस्तान बॉर्डर के इलाके में ही था वहीं के वो रहने वाले भी थे. विक्रमादित्य के शासन काल में अश्वमेध पराक्रमः सिक्के भी मिलते हैं जो इनके सीमा विस्तार को बताते हैं. विक्रमादित्य का समावेशी चरित्र भी सरकार के अप्रोच से मेल खाता है.
इतिहास में की गई गलतियों के सुधार करने के कदम
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से रिटायर प्रोफेसर योगेश्वर तिवारी से भी हमने यही सवाल किया कि 1600 साल बाद चंद्रगुप्त विक्रमादित्य की याद सरकार को क्यों आई? उन्होंने कहा, ‘सरकार के इस कदम को मैं जरूरी समझता हूं’. प्रोफेसर तिवारी कहते हैं कि मैं इसको इतिहास में की गई गलतियों के सुधार करने के कदम के रूप में देख रहा हूं .
प्रोफेसर तिवारी कहते हैं कि विक्रमादित्य किसी मोहनजोदारो की खुदाई से नहीं निकले हैं वो हमारे धरोहर, विरासत और संस्कृति के प्रतीक हैं जिनपर देश के लोगों को गर्व होता है. आजादी के बाद से इतिहास लेखन में वामपंथी इतिहासकारों के जरिए जो नैरेटिव सेट करने की कोशिश हुई जिसने अकबर को महान बताया गया बाकी लोगों की कोई बात ही नहीं हुई.
ये बीजेपी के बंटोगे तो कटोगे के नैरेटिव को सूट करता
डॉक्टर शेखर पाण्डेय प्रयागराज में छात्रों को सिविल सेवा परीक्षा की तैयारी कराते हैं और इतिहास पढ़ाते हैं. उनसे हमने पूछा कि वर्तमान सरकार को विक्रमादित्य में ऐसा क्या दिखा कि वो उनको लेकर इतनी मुखर है? डॉक्टर शेखर पाण्डेय कहते हैं कि विक्रमादित्य बीजेपी के हिंदुत्व की राजनीति को संबल प्रदान करते हुए दिखते हैं.
भारतीय इतिहास में कुल 14 राजाओं ने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि ली है और सबने एक मजबूत हिन्दू राजा के रूप में, नेतृत्व कौशल का लोहा मनवाते हुए सबको साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता दिखाई है. और ये बीजेपी के बंटोगे तो कटोगे के नैरेटिव को सूट करता है.
बीजेपी विक्रमादित्य को उज्जैन से बनारस लेकर क्यों आई?
वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र कुमार इस सावल पर कहते हैं कि लोकसभा चुनाव में पीएम के जीत का अंतर कम होना और प्रदेश में आगामी विधानसभा का चुनाव इसकी वजह बना. हालांकि ये कोई पहली बार नही है कि बीजेपी महापुरुषों का इस्तेमाल नैरेटिव सेट करने में करती हो. काशी-तमिल संगमम, सुहेलदेव महाराज और स्कन्द गुप्त जैसे एपिसोड हम देख चुके हैं.
हालांकि, अब इसका लाभ यूपी चुनाव में कितना मिलेगा अभी से ये कहना मुश्किल है. एमपी के सीएम मोहन यादव 2024 के पहले भी यूपी में कई आजमगढ़, लालगंज सहित कई जगहों का दौरा किए थे. लेकिन बीजेपी वो सारी सीटें हार गई थी. ऐसे में मोहन यादव को बनारस बुलाकर विक्रमादित्य का मंचन कराना एक सोची समझी रणनीति है.
विक्रमादित्य के महानाट्य के मंचन पर सियासी घमासान
एक तरफ बीजेपी इसको वर्तमान पीढ़ी से जोड़ने के पक्ष में दिखाई दे रही है तो विपक्ष विशुद्ध राजनीति बता रहा है. सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य केवल एक राजा नहीं थे, बल्कि न्याय, धर्म और लोककल्याण के प्रतीक थे. उनका जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत है. ऐसे आयोजनों से नई पीढ़ी अपने गौरवशाली इतिहास से जुड़ सकेगा.
एमपी के सीएम मोहन यादव ने कहा कि सम्राट विक्रमादित्य भारतीय इतिहास के ऐसे महान शासक थे जिनकी कीर्ति आज भी जनमानस में जीवित है. उन्होंने कहा कि विक्रमादित्य का नाम न्याय और पराक्रम का पर्याय है. उन्होंने तीन भाईयों की जोड़ी की चर्चा करते हुए कहा कि श्रीराम, लक्ष्मण, श्री कृष्ण, बलदाऊ और भर्तृहरि, विक्रमादित्य देश ही नहीं दुनिया में प्रसिद्ध है.
हालांकि, विपक्ष इसमें विशुद्ध राजनीति देख रहा है. समाजवादी पार्टी के सांसद वीरेंद्र सिंह कहते हैं कि आपको अगर वर्तमान पीढ़ी को विक्रमादित्य के ही बारे में बताना है तो उनको अलग से सिलेबस का हिस्सा बनाइए. इस नाट्य मंचन से क्या होगा?
आप सिर्फ हिन्दू मुसलमान करने वाला नरेटिव सेट करने में लगे हैं. पीडीए की काट के लिए इसका मंचन कराया जा रहा है.