बेटे-बहू संग नंगे पांव राम मंदिर पहुंचे MP ‘अवधेश’, ध्वजारोहण में ना बुलाने की बताई ये वजह

अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद ने परिवार संग नंगे पांव राम मंदिर पहुंचकर दर्शन किए. उन्होंने रामलला के दर्शन पर खुशी व्यक्त की, लेकिन ध्वजारोहण कार्यक्रम में आमंत्रित न किए जाने पर दुख जताया. उन्होंने इसे संसदीय मर्यादा का उल्लंघन बताते हुए दलित पहचान के कारण अनदेखी का आरोप लगाया. सांसद ने सम्मान, समानता और संवैधानिक मर्यादा के लिए अपनी लड़ाई पर जोर दिया.

राममंदिर पहुंचे अयोध्या सांसद अवधेश प्रसाद

राम मंदिर में ध्वजारोहण के चार दिन बाद अयोध्या से समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद अपने परिवार के साथ राम लला के दर्शन करने पहुंचे. नंगे पांव आए सपा सांसद ने राम दरबार में माथा टेका. कहा कि मर्यादा पुरुषोत्तम के दर्शन कर उन्हें खुशी की अनुभूति हो रही है, लेकिन उन्हें दुख भी है कि ध्वजारोहण कार्यक्रम में उन्हें नहीं बुलाया गया. उन्होंने कहा कि भगवान राम उनके इष्ट हैं और उनके दर्शन-पूजन के लिए किसी की अनुमति या आमंत्रण की जरूरत नहीं है.

मंदिर में भ्रमण के बाद सांसद ने कहा कि अभी भी मंदिर का काफी काम बाकी है. इसे पूरा होने में एक साल और लगेंगे. मंदिर में दर्शन के बाद बाहर निकले सांसद ने कहा कि वह नंगे पांव भगवान के दर्शन करने आए थे. उनके साथ बेटे अमित प्रसाद, बहू भाग्यश्री, बेटी डॉ. अलका, पोते अधीश, निजी सचिव शशांक शुक्ल व परिवार के अन्य सदस्य भी मंदिर पहुंचे थे. सभी लोगों ने बड़े भाव के साथ रामलला की चरणों में माथा टेका और आशीर्वाद लिया.

संसदीय मर्यादा के उल्लंघन का आरोप

इस मौके पर उन्होंने कहा कि ध्वजारोहण कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया. इसका उन्हें मलाल है. हालांकि उन्होंने उसी समय तय किया था कि वह नंगे पांव भगवान के दरबार में आएंगे और दर्शन पूजन करेंगे. उन्होंने कहा कि जहां कहीं भी प्रधानमंत्री का कार्यक्रम होता है, स्थानीय सांसद को भी आमंत्रित किया जाता है. यही संसदीय मर्यादा भी है, लेकिन राम मंदिर के कार्यक्रम में स्थानीय सांसद होने के बावजूद मंदिर ट्रस्ट ने उन्हें इग्नोर किया.

राम कृपा से नौ बार मिला जनप्रतिनिधित्व का मौका

सांसद अवधेश प्रसाद ने कहा कि वह राम की भूमि पर पैदा हुए, यही उनके लिए गौरव की बात है. भगवान राम की कृपा से उन्हें नौ बार जनप्रतिनिधित्व का मौका भी मिला. उन्होंने कहा कि भगवान की जन्मस्थली पर बना यह मंदिर बीजेपी ने नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बना है. बावजूद इसके, दलित होने की वजह से इन लोगों ने उन्हें इग्नोर किया, लेकिन भगवान की इच्छा थी तो उन्हें दर्शन के लिए बुलवा ही लिया. कहा कि राम सबके हैं. उनकी लड़ाई किसी पद के लिए नहीं है, किसी निमंत्रण के लिए भी नहीं है, बल्कि सम्मान, बराबरी और संविधान की मर्यादा की है.