BSP जैसे दलित दलों के उभरने के पीछे कांग्रेस की उदासीनता थी… राहुल गांधी
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने दलित विभाग की पार्टी के देशभर के जिलाध्यक्षों की बैठक में हिस्सा लिया. उन्होंने स्वीकार किया कि 80-90 के दशक में कांग्रेस ने दलितों की उपेक्षा की, जिससे BSP जैसे दलों का उदय हुआ. उन्होंने अब दलितों को मुख्य भूमिका में लाने और आउटरीच कार्यक्रम चलाने का आश्वासन दिया.
कांग्रेस सांसद और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने सोमवार को अनुसूचित विभाग के जिला कांग्रेस अध्यक्षों की बैठक में हिस्सा लिया. इस दौरान उन्होंने बिना नाम लिए बीएसपी समेत दलित वोटबैंक वाले दलों के उदय के लिए अपनी ही पार्टी को जिम्मेदार ठहराया. साथ ही अब दलितों को मुख्य भूमिका में लाने और आउटरीच कार्यक्रम चलाने का आश्वासन दिया.
कांग्रेस मुख्यालय इंदिरा भवन में आयोजित इस बैठक में राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि 80 और 90 के दशक में पार्टी दलितों को लेकर उदासीन हो गई. उनके मुद्दों को तरजीह नहीं दी. इस वक्त कांशीराम दलितों की आवाज बनें. उन्होंने दलितों के लिए बेहतर भूमिका निभाई. साथ ही बदलाव की ओर बढ़ते कदमों का हवाला देकर भरोसा दिया.
राहुल गांधी ने कहा कि कांग्रेस की इसी उपेक्षा की वजह से दलित जातिवादी दलों का उदय हुआ और दलित कांग्रेस से दूर हुए. ऐसे में अब हम चीजें बदल रहे हैं, दलित अब मुख्य भूमिका में होंगे. बैठक में एससी विभाग के अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम ने राहुल गांधी को आश्वासन दिया कि, जो रास्ता राहुल गांधी दिखा रहे हैं, हम उस रास्ते पर आगे बढ़ रहे हैं.
बता दें कि अगले साल की उत्तर प्रदेश समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं. इसे देखते हुए कांग्रेस एक देशव्यापी आउटरीच प्रोग्राम की योजना बना रही है, जिसका मकसद पार्टी की अनुसूचित जातियों (SC) की मिली-जुली पहल के जरिए दलितों को एकजुट करना है. राहुल गांधी कांग्रेस की पुरानी गलतियों को स्वीकार कर आगे की रणनीति बना रहे हैं.
कांग्रेस नेताओं का मानना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान विपक्ष के नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी के “संविधान बचाओ” कैंपेन को दलितों, खासकर उत्तर प्रदेश में, के बीच समर्थन मिला था और इसने राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी के बेहतर प्रदर्शन में मदद की. कांग्रेस ने 2024 में 99 लोकसभा सीटें जीतीं, जबकि उत्तर प्रदेश में भी बड़ी सफलता मिली थी.
कांग्रेस-समाजवादी पार्टी गठबंधन ने राज्य की 80 सीटों में से 43 सीटें हासिल कीं, बीजेपी ने 33 सीटें जीतीं, जो 2019 में 62 थीं. पार्टी नेताओं का तर्क है कि राज्य में विपक्षी गठबंधन के प्रदर्शन में दलितों के समर्थन ने अहम भूमिका निभाई.