पहले नर बलि, फिर पत्थर फेंक बहाया जाने लगा खून; वाग्वाल युद्ध का बदला स्वरूप… लेकिन कायम है परंपरा

उत्तराखंड के चंपावत में प्रसिद्ध वाग्वाल युद्ध मां वाराही देवी को समर्पित एक सदियों पुरानी परंपरा है. कभी नरबलि से शुरू हुई यह प्रथा, बाद में पत्थरों से रक्त बहाने के रूप में विकसित हुई. साल 2013 से कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद, यह अब फल और फूलों से खेला जाने वाला अनोखा पर्व बन गया है, जो परंपरा और बदलाव का अद्भुत संगम है.

फाइल फोटो

उत्तराखंड के चंपावत में एक बार फिर वाग्वाल युद्ध के लिए रणभूमि सज गई है. चार खामों और सात थोकों की सेनाएं सज रही हैं, तरह तरह के हथियार तैयार किए जा रहे हैं. मां वाराही देवी को खुश करने के लिए 28 अगस्त यानी रक्षाबंधन के दिन इन सेनाओं के बीच भीषण संग्राम होगा. इसी क्रम में 13 दिन चलने वाले इस वाग्वाल मेले का रविवार को कैबिनेट मंत्री राम सिंह कैड़ा और जिला पंचायत अध्यक्ष आनंद सिंह अधिकारी ने हनुमान मंदिर गेट के पास शुभारंभ किया.

इस मौके पर हनुमान मंदिर से मां वाराही के धाम तक स्कूली बच्चों ने झांकी निकाली और माता के जयकारे लगाए. इस मेले का समापन चार सितंबर को पुरस्कार वितरण के साथ होगा. इस वाग्वाल मेले की सदियों पुरानी परंपरा है. कहा जाता है कि सैकड़ों साल पहले तक माता वाराही देवी को खुश करने के लिए यहां नरबलि होती थी. फिर लोगों ने माता की घनघोर पूजा की और एक नई परंपरा शुरू हो गई कि एक नरबलि के बराबर खून बहाया जाएगा. इसके लिए लोग एक दूसरे पर ईंट-पत्थर फेंकते थे. इसे वाग्वाल युद्ध का नाम दिया गया.

2013 में बदल गया स्वरूप

इस वाग्वाल युद्ध में चम्याल, गहड़वाल, वालिक और लमगड़िया खाम के लोग शामिल होते हैं. साल 2013 तक ये चारों खामों के योद्धा एक दूसरे पर पत्थरों की बौछार करते थे. वहीं जब आभाष होता था कि एक नरबलि के बराबर खून निकल गया तो मंदिर के पुजारी चंवर झुलाते हुए खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ के मैदान में आते और वाग्वाल युद्ध रूक जाता था. इसके बाद सभी योद्धा एक-दूसरे के गले मिलते थे. साल 2013 में कोर्ट ने इस परंपरा में हस्तक्षेप किया और तब से पत्थरों की जगह फल और फूलों से वाग्वाल युद्ध होने लगा.

जानें क्या है वाग्वाल की परंपरा

स्थानीय लोगों के मुताबिक सदियों से यहां नरबलि होती रही है. कालांतर में एक बार चम्याल खाम की बुजुर्ग महिला के पोते की बारी आई तो उसने वंश बचाने के लिए मां वाराही देवी की घनघोर तपस्या की. फिर एक नरबलि के बराबर रक्त बहाने की परंपरा शुरू हुई. यह परंपरा साल 2013 तक चली, लेकिन उसके बाद से खून बहाने की परंपरा खत्म हो गई है. हालांकि अभी भी वाग्वाल युद्ध पहले की ही तरह चार खामों के बीच खेला जाता है.

ऐसे सजती हैं सेनाएं

वाग्वाल युद्ध के लिए पूर्वी छोर से चम्याल और गहड़वाल खाम बग्वाल युद्ध में उतरते हैं. वहीं पश्चिमी छोर से वालिक और लमगडिया खाम के योद्धा मोर्चा संभालते हैं. पहले दो खाम के लोग पत्थर फेंकते थे तो बाकी दो खाम के योद्धा फरों की ढाल बना कर खुद का बचाव करते थे. अब सभी खाम के लोग एक दूसरे पर फूल और फल उछालते हैं. इस दौरान चारों खाम के लोग अलग-अलग साफे पहन कर खोली खाड़ दुर्वाचौड़ के मैदान में पहुंचते हैं. इनमें गहड़वाल खाम के लोग केसरिया तो चम्याल खाम के लोग गुलाबी साफा बांदते हैं. वहीं वालिक खाम के लोग सफेद और लमगड़िया खाम के लोग पीले साफे में वाग्वाल खेलते हैं.

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