‘जिसकी मजहबी हैसियत नहीं, उस पर फतवे का क्या मतलब’, आमिर खान विवाद पर मौलाना रजवी की दो टूक
मौलाना शाहबुद्दीन रजवी ने अभिनेता आमिर खान पर फतवे को लेकर बड़ी बात कही. उन्होंने बताया कि फतवा सिर्फ शरीयत मानने वाले पर ही लागू होता है. उन्होंने यह भी कहा कि आमिर खान ने तीन शादियां कीं और तीनों महिलाएं गैर-मुस्लिम थीं. रजवी ने पूछा- पहली शादी पर क्यों नहीं आया फतवा?
फिल्म अभिनेता आमिर खान को लेकर जारी फतवे की चर्चा के बीच ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना शहाबुद्दीन रजवी का बयान सामने आया है. बरेली में उन्होंने कहा कि फतवा देना गलत नहीं है, लेकिन किसी भी व्यक्ति के खिलाफ फतवा जारी करने से पहले उसकी धार्मिक स्थिति और पृष्ठभूमि को समझना जरूरी है.
मौलाना रजवी ने कहा कि फतवा केवल उसी व्यक्ति पर लागू होता है, जो शरीयत को मानता हो और इस्लाम के नियमों का पालन करता हो. अगर कोई व्यक्ति धार्मिक नियमों का पालन ही नहीं करता और उसकी पहचान केवल नाम तक सीमित रह गई है, तो उसके खिलाफ फतवा जारी करने का कोई खास मतलब नहीं रह जाता है.
पहली शादी के समय ही यह कदम उठाते?
मौलाना रजवी का कहना है कि पहले देखना जरूरी है कि जिस पर फतवा दिया जा रहा है, वह वास्तव में धार्मिक मामलों को कितना मानता है. जरूरत पड़े तो उससे बात भी करनी चाहिए, उसके बाद ही कोई फैसला होना चाहिए. मौलाना ने अपने बयान में आमिर खान की शादियों का भी जिक्र किया. और सवाल किया कि पहली शादी पर फतवा क्यों नहीं आया?
उन्होंने कहा कि आमिर खान ने अलग-अलग समय पर तीन शादियां कीं और तीनों महिलाएं गैर-मुस्लिम थीं. अगर किसी बात पर धार्मिक आपत्ति थी और फतवा देना जरूरी था, तो पहली शादी के समय ही यह कदम उठाया जाना चाहिए था. अगर उस समय ऐसा नहीं हुआ, तो दूसरी शादी के वक्त भी यह किया जा सकता था, लेकिन तब भी ऐसा नहीं हुआ.
मौलाना नाज़िम अशरफी ने किया फतवे का समर्थन
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने कहा कि अब कई साल बाद इस तरह फतवा जारी करने से सवाल खड़े होते हैं. उनके मुताबिक जिस व्यक्ति की धार्मिक हैसियत पहले ही खत्म मानी जा रही हो, उसके खिलाफ फतवा जारी करने का कोई व्यावहारिक फायदा नहीं है. उन्होंने कहा कि हर मामले में पूरी जानकारी के आधार पर ही धार्मिक राय दी जानी चाहिए.
अभिनेता आमिर खान के तीसरे निकाह को लेकर अलीगढ़ से फतवा जारी हुआ है. मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना नाज़िम अशरफी ने फतवे का समर्थन किया है. उन्होंने इस्लाम में निकाह कोई मजाक नहीं है, इसके बेहद कड़े नियमों का पालन करना हर हाल में अनिवार्य है. यदि कोई गैर-मुस्लिम लड़की सिर्फ निकाह के वक्त कलमा पढ़ लेती है, तो वह मुस्लिम नहीं हो जाती.
