‘यूपी में पुलिस और अधिकारी संविधान नहीं सरकार के लिए वफादार’, HC ने क्यों की ऐसी टिप्पणी?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर कड़ा रुख अपनाया है, खासकर गैंगस्टर एक्ट के मनमाने इस्तेमाल और 'एनकाउंटर किलिंग' पर. कोर्ट ने गाजियाबाद के एक मामले में पुलिस की आलोचना करते हुए कहा कि अधिकारियों की वफादारी संविधान के प्रति कम और सरकार के लिए ज्यादा दिखती है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट Image Credit:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली और गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े कानूनों के मनमाने इस्तेमाल पर बेहद सख्त रुख अपनाया है. जस्टिस विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने गाजियाबाद के नंदग्राम थाने में दर्ज एक मामले को पूरी तरह खारिज करते हुए 31 पन्नों का एक विस्तृत आदेश जारी किया. अदालत ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि पुलिस द्वारा ‘एनकाउंटर किलिंग’, चुनिंदा कार्रवाइयां और असुविधाजनक लोगों को निशाना बनाने के लिए गैंगस्टर एक्ट का लक्षित उपयोग अब न्यायिक चिंता का एक बड़ा विषय बन चुका है.

कोर्ट ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि फील्ड में तैनात अधिकारियों की वफादारी अक्सर संविधान के प्रति न होकर सत्तारूढ़ व्यवस्था के प्रति दिखाई देती है. ट्रांसफर-पोस्टिंग के दबाव और उसकी अर्थव्यवस्था से वाकिफ होने के कारण अधिकारी अपने आचरण को राजनीतिक आकाओं को संतुष्ट करने के लिए ढाल लेते हैं, जिससे कानून का निष्पक्ष पालन पूरी तरह प्रभावित होता है.

महिला को बिना सबूत 80 दिनों तक जेल में रखा

यह पूरा विवाद मूल रूप से एक दीवानी यानी सिविल मामले से जुड़ा था, जिसे पुलिस ने आपराधिक रंग दे दिया. साल 2023 में याचिकाकर्ता राजेंद्र त्यागी, उनके बेटे और उनकी बहू के खिलाफ गाजियाबाद में गैंगस्टर एक्ट के तहत FIR दर्ज की गई थी. हाईकोर्ट ने मामले की समीक्षा के बाद पाया कि आरोपियों पर धोखाधड़ी या जालसाजी के आरोप तो हो सकते हैं, लेकिन गैंगस्टर एक्ट दूर-दूर तक मौजूद नहीं थे.

पुलिस के अमानवीय चेहरे पर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने 35 वर्षीय गृहणी ललिता त्यागी के साथ हुए व्यवहार का विशेष जिक्र किया. चार्जशीट में उनके खिलाफ कोई भी ठोस सबूत न होने के बावजूद, उन्हें एफआईआर दर्ज होने के अगले ही दिन गिरफ्तार कर लिया गया और लगभग 80 दिनों तक न्यायिक हिरासत में जेल में रखा गया.

कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर को लिया निशाने पर

अदालत ने इस गिरफ्तारी को पूरी तरह से अवैध, मनमाना और स्थापित कानूनी मानदंडों के खिलाफ करार दिया. साथ ही कहा कि राज्य के प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही की भारी कमी है, जिसके कारण निर्दोष नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन हो रहा है. इस दौरान गाजियाबाद के तत्कालीन पुलिस कमिश्नर अजय कुमार मिश्रा जो वर्तमान में प्रयागराज के आईजी रेंज है सीधे कोर्ट के निशाने पर आए.

अदालत ने कहा कि वह अपने अधीनस्थों पर पर्यवेक्षी नियंत्रण बनाए रखने में पूरी तरह विफल रहे और यह पूरी गलत कार्रवाई उन्हीं की देखरेख और मंजूरी से हुई थी. हालांकि, कोर्ट ने इस अधिकारी के भविष्य और करियर की संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए थोड़ा नरम रुख अपनाया और उन्हें कड़ी हिदायत दी कि भविष्य में अपने आधिकारिक कार्यों के निर्वहन में अधिक सतर्क और सावधान रहें.

कानपुर के बिकरू कांड का हवाला देते हुए फटकारा

अपने फैसले में हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि गृह सचिव जैसे उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों को निष्पक्ष और संवैधानिक दायरे में काम करना चाहिए, लेकिन कुछ मामलों में यह पद व्यक्तिगत या बाहरी हितों का माध्यम बन गए हैं. अदालत ने साल 2020 के चर्चित कानपुर के बिकरू कांड का हवाला देते हुए याद दिलाया कि उस घटना में पुलिस और अपराधियों के बीच स्पष्ट सांठगांठ सामने आई थी, लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई.

इसी मानसिकता के कारण गैंगस्टर एक्ट जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल अक्सर छोटे या बेकसूर लोगों के खिलाफ किया जाता है, जबकि बड़े संगठित अपराधी आसानी से बच निकलते हैं. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राजेंद्र त्यागी और अन्य याचिकाकर्ताओं को बड़ी राहत देते हुए उनकी याचिका को स्वीकार कर लिया. और ट्रायल कोर्ट में की कार्यवाही को निरस्त कर दिया.

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