हापुड़ में नोएडा जैसी घटना, खुले नाले में गिरकर ढाई साल की मासूम की मौत

हापुड़ में सेक्टर 150 जैसी घटना सामने आई है. यहां एक खुले नाले में गिरकर ढाई साल की बच्ची की मौत हो गई है. सबसे बड़ी बात इस नाले में गिरकर एक साल पहले भी एक बच्चे की मौत हो गई थी. तबसे लगातार इस नाले को बंद करने की मांग की जा रही थी. लेकिन काफी शिकायतों के बाद भी प्रशासन की तरफ से नाले नहीं ढका गया.

खुले नाले में गिरकर ढाई साल की बच्ची की मौत Image Credit:

हापुड़ के धौलाना तहसील क्षेत्र में सिस्टम की लापरवाही के चलते एक मासूम की जान चली गई. गांव सपनावत में बच्चों के साथ खेल रही ढाई साल की सिद्धि की नाले में गिरकर मौत हो गई. मासूम की मौत से परिवार में कोहराम मचा हुआ है. ग्रामीणों के मुताबिक एक साल पहले भी इस नाले में गिरकर 5 साल के मासूम बच्चे विराज की भी मौत हो चुकी है. लेकिन इसके बावजूद प्रशासन की तरफ से कोई कदम नहीं उठाया गया था. जिस बच्ची की नाले में गिरकर मौत हुई, उसके पिता ग्राम प्रधान से पहले नाले को ढकने की अर्जी दे चुके हैं. लेकिन प्रधान की तरफ से कोई सख्त रूख नहीं अपनाया गया.

बच्ची के पिता ने सीएम योगी से लगाई गुहार

अब बच्ची के पिता ने मुख्यमंत्री से लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई करने और नाले को जल्द से जल्द ढकने की गुहार लगाई है. ढाई साल की मासूम की मौत के बाद पुलिस प्रशासन भी जांच के लिए पहुंचा है. बच्ची के पिता गौरव कुमार ने बताया कि उनके घर के सामने एक खुला हुआ नाला है. नाले के आसपास उनकी ढाई वर्षीय पुत्री सिद्धि व पड़ोस में रहने वाले कुछ बच्चे खेलते रहते हैं. उनकी पुत्री पड़ोसी बच्चों के साथ नाले के पास खेल रही थी. खेलते-खेलते उनकी बेटी अचानक नाले में गिर गई, लेकिन किसी को पता नहीं चला.

नाले में मिला बच्ची का शव

गौरव ने आगे बताया कि काफी देर तक बच्ची के नहीं दिखने पर परिजनों ने उसकी तलाश शुरू की. लेकिन बच्ची का सुराग नहीं मिला. घंटों तलाश के बाद लोग नाले के पास पहुंचे तो उनकी पुत्री नाले के पानी में दिखाई दी. आसपास के लोग नाले में उतर गए, बच्ची को बाहर निकाला गया, लेकिन तबतक उसकी मौत हो गई थी. बेटी की मौत उनकी पत्नी काजल, पिता रामअवतार, मां गुड्डी देवी, बड़े भाई कपिल व भाभी कोमल का रो रोकर बुरा हाल है.

बढ़ गए हैं ऐसे हादसे

हर साल नालों में गिरकर कई लोगों की जान जा रही है. अब धौलाना के सपनावत गांव में बच्ची की मौत हो गई. हर बार प्रभावी उपाय करने के दावे किए जाते हैं. जिम्मेदारों द्वारा आश्वासनों का मरहम लगाकर मामलों को दबा दिया जाता है. नतीजा, कुछ समय बाद फिर ऐसी घटना घटित हो जाती हैं. ऐसे मामलों को पीड़ित नियति मानकर सब्र कर लेते हैं. वहीं जिम्मेदार मामले के शांत हो जाने पर लंबी चादर तानकर सो जाते हैं.