4 महीने में पूरी करें भर्ती… यूपी बाल अधिकार आयोग में खाली अध्यक्ष-सदस्य पदों से HC नाराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी बाल अधिकार संरक्षण आयोग के रिक्त पदों पर चिंता जाहिर की है. साथ ही राज्य सरकार को चार महीने में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति का निर्देश दिया है. यह आदेश दायर जनहित याचिका पर आया है, जिसमें बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और आयोग की निष्क्रियता पर सवाल किया गया था.
इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उत्तर प्रदेश राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग (UPSCPCR) के लंबे समय से रिक्त पड़े पदों पर सख्त ऐतराज जताया है. साथ ही राज्य सरकार को आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया युद्धस्तर पर पूरी करने का निर्देश दिया है. अदालत ने यह प्रक्रिया आदेश की तिथि से चार महीने के भीतर पूरी करने को कहा है.
यह आदेश जस्टिस शेखर बी. सराफ और जज अभदेश कुमार चौधरी की खंडपीठ ने ह्यूमन यूनिटी मूवमेंट बनाम राज्य सरकार एवं अन्य के मामले में दायर जनहित याचिका पर दिया है. बाल अधिकार आयोग का कार्यकाल 16 नवंबर 2024 को समाप्त हो गया था. तब से अध्यक्ष और सदस्यों के पद रिक्त होने के कारण आयोग पूरी तरह से निष्क्रिय पड़ा है.
अध्यक्ष-सदस्यों की नियुक्ति जल्द से जल्द करें
याचिकाकर्ता संस्था ह्यूमन यूनिटी मूवमेंट ने तर्क दिया कि आयोग बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा, बाल श्रम, बाल तस्करी, पॉक्सो मामलों की निगरानी, बाल संरक्षण संस्थानों के निरीक्षण और शिक्षा के अधिकार अधिनियम के क्रियान्वयन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों का वैधानिक निकाय है. वहीं, अदालत ने जनहित याचिका का निस्तारण करते हुए शीघ्र कार्यवाही की अपेक्षा की.
अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार को निर्देशित किया कि वह इस विषय पर तत्काल ध्यान दे और आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया को जल्द से जल्द पूरा करें. साथ ही कोर्ट ने इस अपेक्षा के साथ याचिका का निस्तारण किया कि यूपी सरकार की ओर से चार महीने के अंदर नियुक्ति पक्रिया पूरी कर ली जाएगी.
‘इन अहम पदों को खाली नहीं छोड़ा जा सकता’
याचिकाकर्ता ह्यूमन यूनिटी मूवमेंट की सचिव डॉ संगीता शर्मा की ओर से अधिवक्ता दुर्गेश कुमार शुक्ला एवं अधिवक्ता कुमारी विश्व मोहिनी ने पक्ष रखा. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बाल अधिकार संरक्षण आयोग में इन महत्वपूर्ण पदों को लंबे समय तक खाली नहीं छोड़ा जा सकता, क्योंकि इससे बच्चों से जुड़े मामलों की सुनवाई प्रभावित हो रही है.