सड़क पर नमाज पर चुप्पी, भंडारे में पुड़ी-सब्जी… क्या अखिलेश ने बदली अपनी रणनीति?
क्या अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति बदल दी है? यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि बीते दिनों में अखिलेश यादव ने अपनी सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि अपनाने की कोशिश की है. सपा अब अपनी छवि को मुस्लिम-यादव राजनीति से आगे ले जाकर पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी PDA समीकरण के साथ व्यापक सामाजिक आधार बनाने की कोशिश कर रही है.
उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक जमीन तैयार होने लगी है और समाजवादी पार्टी ने भी अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करना शुरू कर दिया है. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव अब केवल पारंपरिक जातीय राजनीति तक सीमित नजर नहीं आ रहे, बल्कि संविधान-आरक्षण-बेरोजगारी-महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को केंद्र में रखकर व्यापक राजनीतिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं. इसके साथ ही ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ की तरफ जा रहे हैं.
हाल के दिनों में अखिलेश यादव की राजनीतिक गतिविधियों पर नजर डालें तो साफ संकेत मिलते हैं कि सपा अब केवल मुस्लिम-यादव समीकरण तक सीमित छवि से बाहर निकलने पर काम कर रही है. पार्टी नेतृत्व अब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक यानी पीडीए फार्मूले को सामाजिक न्याय और संविधान बचाने की राजनीति के साथ जोड़कर आगे बढ़ा रहा है. सोमवार को लखनऊ में आयोजित प्रेसवार्ता में अखिलेश यादव ने ‘PDA आरक्षण घोटाला’ नामक पुस्तिका जारी की.
सपा ने आरक्षण घोटाले का आरोप लगाते हुए जारी की किताब
लाल रंग की इस किताब में ‘संविधान बचाओ-आरक्षण बचाओ’ का नारा प्रमुखता से लिखा गया. इसके साथ ही ‘PDA ऑडिट अंक-1’ शीर्षक से एक तरह का आरोप पत्र भी जारी किया गया, जिसमें सरकार पर आरक्षित वर्गों के अधिकारों की अनदेखी करने का आरोप लगाया गया है. पुस्तिका में दावा किया गया कि प्रदेश में 22 भर्ती परीक्षाओं और 11,514 से अधिक पीडीए आरक्षित सीटों में गड़बड़ी हुई है. सपा ने इसे ‘आरक्षण की लूट’ बताया है.
CM के नमाज वाले बयान पर प्रतिक्रिया देने से बचते रहे अखिलेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव अब सीधे तौर पर भाजपा की हिंदुत्व राजनीति का विरोध करने के बजाय उसके समानांतर ‘समावेशी सांस्कृतिक राजनीति’ का रास्ता अपना रहे हैं. यही वजह है कि वे विवादित धार्मिक मुद्दों पर तीखी प्रतिक्रिया देने से बचते नजर आते हैं. हाल ही में जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सार्वजनिक स्थानों और सड़कों पर नमाज को लेकर बयान दिया था, तब अखिलेश यादव ने सीधे बयानबाजी से दूरी बनाए रखी.
धार्मिक कार्यक्रमों में ज्यादा नजर आ रहे हैं अखिलेश
इसके बजाय अखिलेश यादव ने मंदिरों में दर्शन, धार्मिक आयोजनों में भागीदारी और सामाजिक सद्भाव का संदेश देने की रणनीति अपनाई. अखिलेश यादव इन दिनों कई धार्मिक कार्यक्रमों में भी सक्रिय नजर आ रहे हैं. वह भंडारों में शामिल हो रहे हैं, साधु-संतों से मुलाकात कर रहे हैं और सार्वजनिक मंचों से गंगा-जमुनी तहजीब, भाईचारे और सामाजिक एकता की बात कर रहे हैं. यही नहीं, इटावा में भगवान भोलेनाथ का मंदिर निर्माण भी करा रहे हैं.
‘संविधान और सामाजिक न्याय’ को मुद्दा बना रही है सपा
सपा के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक पार्टी नेतृत्व ने अपने नेताओं को धर्म और जाति पर विवादित बयान देने से बचने के निर्देश दिए हैं. पार्टी नहीं चाहती कि चुनाव से पहले कोई ऐसा बयान आए जिससे उसका सामाजिक समीकरण प्रभावित होय. यही वजह है कि सपा अब आक्रामक धार्मिक राजनीति से दूरी बनाकर ‘संविधान और सामाजिक न्याय’ की लाइन पर ज्यादा जोर देती नजर आ रही है. विश्लेषकों का मानना है कि 2024 लोकसभा चुनाव के बाद समाजवादी पार्टी को यह एहसास हुआ है कि केवल जातीय समीकरणों के सहारे भाजपा को चुनौती देना आसान नहीं होगा.
PDA के साथ ही हिंदू मतदाताओं में स्वीकार्यता बढ़ाने की कवायद
इसलिए सपा अब अपनी राजनीति को नए तरीके से परिभाषित करने की कोशिश कर रही है. इसमें एक तरफ पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक गठजोड़ को मजबूत करने का प्रयास है, तो दूसरी तरफ हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की भी रणनीति शामिल है. अखिलेश, भाजपा पर सीधे धार्मिक हमले करने के बजाय आरक्षण, बेरोजगारी और संविधान जैसे मुद्दों के जरिए वैचारिक लड़ाई लड़ना चाहते हैं.
बीजेपी के हार्ड हिंदुत्व के सामने अखिलेश यादव ने बदली रणनीति
उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह बदलाव इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 2027 विधानसभा चुनाव में भाजपा एक बार फिर हिंदुत्व और विकास के मुद्दे पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है. ऐसे में समाजवादी पार्टी सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों को मुख्य चुनावी एजेंडा बनाकर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है. सपा की रणनीति में पीडीए फार्मूला सबसे अहम माना जा रहा है.
