UP में सत्ता के गलियारों तक आम महिलाओं की पहुंच बढ़ेगी या सिर्फ आंकड़ों में ही होगा इजाफा?

उत्तर प्रदेश में 1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक महिलाएं वोट तो पुरुषों से ज्यादा डाल रही हैं, लेकिन संसद और विधानसभा तक पहुंचने का रास्ता उनके लिए आसान नहीं रहा है.अबतक 40 फीसदी लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां आजतक कोई महिला सांसद निर्वाचित नहीं हो पाई है.वहीं, 50 फीसदी विधानसभा सीटों पर भी आज तक कोई महिला नहीं चुनी गई है.

महिला आरक्षण बिल से यूपी में कितना आएगा बदलाव

महिला आरक्षण बिल लागू होने के बाद प्रदेश की राजनीति में सिर्फ आंकड़ों में तब्दीली आएगी या फिर सत्ता के गलियारे में ताकत का संतुलन बदलेगा, इसपर लगातार सवाल उठ रहे हैं. दशकों से वोटिंग में आगे रहने के बावजूद महिलाएं सत्ता के केंद्र में कभी 10 फीसदी से ज्यादा नहीं पहुंची हैं. अब जब लोकसभा और विधानसभाओं में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित होने जा रही हैं, तो सवाल यह है कि क्या गिनती के साथ ताकत भी बढ़ेगी, बदलाव आएगा या फिर पुरानी तस्वीर ही दोहराई जाएगी?

उत्तर प्रदेश में महिलाओं की राजनीतिक यात्रा का इतिहास गौरव और निराशा दोनों से भरा है.1951-52 के पहले आम चुनाव से लेकर आज तक महिलाएं वोट तो पुरुषों से ज्यादा डाल रही हैं, लेकिन संसद और विधानसभा तक पहुंचने का रास्ता उनके लिए आसान नहीं रहा है. 2019 और 2024 के लोकसभा में 20 सीटें ऐसी हैं जहां पुरुषों की संख्या के मुकाबले महिलाओं ने ज्यादा मतदान किया. फिर भी अब तक 40 फीसदी लोकसभा सीटें ऐसी हैं, जहां आजतक कोई महिला सांसद निर्वाचित नहीं हो पाई है. वहीं, 50 फीसदी विधानसभा सीटों पर आज तक कोई महिला नहीं चुनी गई, जबकि वोटर लिस्ट में महिलाओं की हिस्सेदारी 46 फीसदी के करीब है.

33 लोकसभा सीट, 200 विधानसभा सीटों पर कभी नहीं निर्वाचित हुई महिला

आगरा, सहारनपुर, गोरखपुर, वाराणसी, जौनपुर, कुशीनगर जैसी 33 लोकसभा सीटें और 200 विधानसभा क्षेत्र आज भी बिना महिला नुमाइंदगी के हैं. 1957 से लेकर 2022 तक के विधानसभा चुनावों के आंकड़े यही कहानी दोहराते हैं. 1951 में 50 महिला उम्मीदवारों में से 20 जीतीं. 1957 में 39 में 18 महिलाएं चुनकर आईं. 1962 में 61 में से 20 महिलाएं. .लेकिन 1967 में 39 उम्मीदवारों में सिर्फ 6 जीत सकीं.1974 में 92 में 21, 1985 में 168 में 31 और 1991 में 226 महिला उम्मीदवारों में सिर्फ 10 जीत पाईं. 2012 तक यह संख्या 35 तक पहुंची. 2017 में 398 महिला उम्मीदवारों में 42 जीतीं और 2022 में 559 महिला उम्मीदवारों में 51 महिला उम्मीदवार जीतकर आईं. इसमें 4 सीटें उपचुनाव की हैं. यानी कुल सीटों का महज 12.65 फीसदी.

यूपी सरकार में भी महिलाओं की भागीदारी 10 फीसदी से पार नहीं गई

सरकार में भी महिलाओं की भागीदारी कभी 10 फीसदी पार नहीं कर पाई. 2017 में 5 महिलाओं को पहली बार मंत्री बनाया गया. लेकिन दो बार कैबिनेट विस्तार में कुछ मंत्रियों को हटाया तो कुछ नए चेहरे को मंत्री बनाया गया. 2022 में भी योगी सरकार में पांच महिला मंत्री बनीं, जो पिछले तीन दशक का रिकॉर्ड है. नेतृत्व की बात करें तो उत्तर प्रदेश ने देश को पहली महिला राज्यपाल, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री देने का गौरव हासिल किया. सुचेता कृपलानी, मायावती जैसी महिलाएं मुख्यमंत्री बनीं, लेकिन उनके मंत्रिमंडलों में महिलाओं की संख्या एक से चार फीसदी तक ही रही. संपूर्णानंद की सरकार में पहली महिला मंत्री प्रकाशवती सूद बनीं.वीर बहादुर सिंह की सरकार में छह, एनडी तिवारी में सात महिलाएं मंत्री बनीं.

मायावती और अखिलेश के कार्यकाल में और बुरा था हाल

मायावती के चार कार्यकालों में महिलाओं की भागीदारी कभी चार फीसदी से ऊपर नहीं गई. 2007 में मायावती के साथ सिर्फ ओमवती मंत्री बनीं.अखिलेश यादव की 2012 सरकार में 2 महिला मंत्री थीं. 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 45, सपा ने 42 और बसपा ने 37 महिलाओं को टिकट दिए. कांग्रेस ने 40 फीसदी टिकट देने का प्रयोग किया, लेकिन सिर्फ एक जीती. राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि आरक्षण अब दलों को कानूनी रूप से मजबूर करेगा.परसीमन के बाद लोकसभा की 120 सीटों में 40 और विधानसभा की 603 सीटों में कम से कम 200 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.यह चार दशक की कुल भागीदारी से ज्यादा होगा.लेकिन संख्या बढ़ने भर से ताकत नहीं बढ़ती.

‘सरपंच पति’ जैसी स्थिति ना हो जाए

1993 के संविधान संशोधन के बाद पंचायतों और नगरीय निकायों में एक-तिहाई आरक्षण ने यूपी की आधी से ज्यादा ग्राम पंचायतों, ब्लॉक समितियों और जिला पंचायतों की कमान महिलाओं के हाथ में सौंपी. ग्राम प्रधान के 58,176 पदों में 53.70 फीसदी, ब्लॉक प्रमुख के 826 पदों में 54.11 फीसदी, जिला पंचायत अध्यक्ष के 75 पदों में 56 फीसदी महिलाएं हैं.नगर निगम पार्षदों में 37.54 फीसदी, नगर पालिका अध्यक्षों में 48.74 फीसदी. लेकिन ज्यादातर मामलों में बागडोर पुरुष रिश्तेदारों के हाथ में रहती है.‘सरपंच पति’ की परिघटना आम हो गई.चेहरा महिला का, लेकिन फैसला पुरुष का.

एडीआर की रिपोर्ट और भी चिंताजनक

एडीआर की रिपोर्ट और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करती है.राज्यसभा, लोकसभा, विधानसभा और विधान परिषद में 42 फीसदी महिला प्रतिनिधि सियासी परिवारों से आती हैं. यूपी की मौजूदा सात लोकसभा सांसदों में छह बड़े राजनीतिक परिवारों से हैं और एक सेलिब्रिटी. पंचायतों में भी आरक्षण अक्सर परिवार की कुर्सी बचाने का रास्ता बन गया.आम महिला के लिए स्वतंत्र रूप से राजनीति में आने और नेतृत्व करने का माहौल अभी भी नहीं बना. महिला आरक्षण विधेयक अब इस पुरानी व्यवस्था को चुनौती देगा. टिकट बंटवारे में दलों को कम से कम एक-तिहाई महिलाओं को जगह देनी पड़ेगी. लेकिन सवाल वही है.क्या यह आरक्षण सिर्फ संख्या बढ़ाएगा या नीति-निर्माण, निर्णय और असली नेतृत्व में आम महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएगा?

संख्या बढ़ाने से पहले सोच बदलनी होगी

पंचायतों का अनुभव बताता है कि संख्या और गुणवत्ता में फर्क है.यदि आरक्षण के साथ महिला उम्मीदवारों को स्वतंत्र रूप से खड़ा करने, उन्हें प्रशिक्षित करने और परिवारवादी राजनीति से ऊपर उठाने की कोशिश नहीं की गई, तो नई व्यवस्था भी पुरानी तस्वीर को ही दोहरा सकती है.उत्तर प्रदेश की 75 साल पुरानी राजनीतिक यात्रा अब एक नई मंजिल पर पहुंच रही है.वोट की ताकत तो महिलाओं के पास पहले से थी.अब सत्ता की ताकत भी उनके हाथ आएगी या फिर यह आरक्षण भी ‘लाभार्थी’ वाली राजनीति का नया चेहरा बन जाएगा? यह आने वाले चुनावों और दलों की सोच पर निर्भर करेगा.लेकिन इतिहास गवाह है.संख्या बढ़ाने से पहले सोच बदलनी होगी.

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