पीला रंग, बदबूदार पानी… नोएडा-ग्रेटर नोएडा में इंदौर जैसा संकट, जहर का घूंट पीने को मजबूर हजारों परिवार

ग्रेटर नोएडा और नोएडा वेस्ट की कई सोसाइटियों में पीला और बदबूदार पानी आने की शिकायत मिल रही है. जानकारी यह भी मिल रही है इस पानी को पीने से कई लोग बीमार भी हो चुके हैं. यह स्थिति तब है जब हाल ही में इंदौर में कई दूषित पानी पीने से कई लोगों के मरने की खबर आई है.

नोएडा में दूषित पानी Image Credit:

इंदौर में दूषित पेयजल से हुई मौतों ने लोगों को झकझोर दिया है. कई राज्यों से पीने के पानी को लेकर लगातार नेगेटिव रिपोर्ट आ रहे हैं. यूपी में भी जलापूर्ति व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. ग्रेटर नोएडा के डेल्टा-1 सेक्टर में भी दूषित पानी की शिकायतें प्रशासन के दावों की पोल खोल रही हैं. यह मामला सिर्फ एक सेक्टर तक सीमित नहीं है बल्कि पूरा नोएडा और ग्रेटर नोएडा इसकी जद में है.

ताजा मामला डेल्टा-1 सेक्टर से शुरू हुआ. यहां बीते तीन दिन से घरों में नलकों में पीने के पानी के साथ सीवर का गंदा पानी मिला आ रहा है. इस पानी का रंग पीला है. इससे तेज बदबू आ रही है. अनजाने में इसके इस्तेमाल के बाद कई घरों में बच्चों और बुजुर्गों की तबीयत बिगड़ गई है. स्थानीय निवासियों के अनुसार अब तक कम से कम आठ लोगों के दूषित पानी पीने से बीमार होने की पुष्टि हुई है.

सेक्टर डेल्टा-1 निवासी विजय सिंह बताते हैं हमारे घर में बच्चे इसी पानी को पी गए. इसके बाद उन्हें उल्टी-दस्त शुरू हो गए. पानी इतना गंदा था कि हाथ धोने में भी बदबू आती थी. मजबूरी में हमें बाहर से बोतलबंद पानी मंगवाना पड़ा. अक्सर यहां इस तरीके की स्थिति आती रहती है, लेकिन अब तक इसका कोई समाधान नहीं किया गया है.

शिकायतों को किया गया नजरअंदाज

डेल्टा-1 आरडब्ल्यूए के उपाध्यक्ष पंकज नागर का कहना है कि यह समस्या अचानक नहीं आई. हमने तीन दिन तक लगातार जल विभाग में पानी को लेकर शिकायत की. लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. यह स्थिति पहली बार नहीं आई है. इससे पहले भी दूषित पानी की सप्लाई हुई थी और लोग बीमार पड़े थे. हर बार अस्थायी मरम्मत कर मामला दबा दिया जाता है. उनकी मांग है कि सिर्फ लीकेज ठीक करना समाधान नहीं है, बल्कि पूरे सेक्टर की पाइपलाइन का तकनीकी ऑडिट होना चाहिए.

डेल्टा-1 निवासी रुक्मणी सिंह भाटी बताती हैं कि नल खोलते ही बदबू आती थी. बच्चों ने जैसे ही पानी पिया उन्हें बुखार और पेट दर्द हो गया. सवाल यह है कि अगर किसी की हालत ज्यादा खराब हो जाती तो जिम्मेदारी कौन लेता. स्थानीय लोगों का कहना है कि कई परिवारों ने एहतियात के तौर पर अब नल का पानी पीना पूरी तरह बंद कर दिया है. बीमार पड़े लोगों का इलाज निजी अस्पतालों में कराया गया. लेकिन अब तक न तो ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण और न ही जिला प्रशासन ने इलाज का खर्च उठाने या मुआवज़े की कोई घोषणा की है. हालाकि सेक्टर डेल्टा-1 में प्रशासन के की तरफ से मेडिकल कैंप लगाकर सेक्टर के लोगों के स्वास्थ्य की जांच कराई जा रही है.

इंदौर की घटना के बाद प्रशासन अलर्ट मोड में

डेल्टा-1 से शिकायतें मिलने के बाद प्राधिकरण और स्वास्थ्य विभाग की संयुक्त टीम मौके पर पहुंची. टीम ने कई स्थानों पर खुदाई कर जलापूर्ति और सीवर लाइनों की जांच की. अधिकारियों के मुताबिक एक स्थान पर पीने के पानी की लाइन में सीवर लाइन का पानी मिल रहा था. इसे तत्काल ठीक करा लिया गया है.

अधिकारियों का कहना है प्रारंभिक जांच में अधिकांश घरों में पानी साफ पाया गया. एसीईओ सुनील कुमार सिंह का कहना है कि तकनीकी खामी मिली है उसे तुरंत ठीक करा दिया गया है. फिलहाल सभी घरों में साफ पानी की सप्लाई हो रही है. एहतियात के तौर पर पानी के सैंपल लैब भेजे गए हैं .हालांकि प्राधिकरण ने अब तक यह स्पष्ट नहीं किया है कि जांच रिपोर्ट कब सार्वजनिक होगी. एसीईओ अनिल कुमार ने बताया कि फिलहाल जो लोग बीमार हैं उनकी मॉनिटरिंग की जा रही है. बीमार लोगों का ब्लड सैंपल कलेक्ट किया गया है. जो जांच के लिए भेजा गया है.

नोएडा और ग्रेटर नोएडा वेस्ट में भी हालात चिंताजनक

डेल्टा-1 की घटना ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा वेस्ट की कई सोसायटियों की पुरानी चिंता को फिर उजागर कर दिया है.ग्रेटर नोएडा वेस्ट की आम्रपाली, गौर सिटी और अन्य बड़ी सोसायटियों में रहने वाले लोग बताते हैं कि वे सालों से प्राधिकरण के पानी को पीने लायक नहीं मानते. ग्रेटर नोएडा वेस्ट निवासी अमित चौधरी कहते हैं हम हर महीने हजारों रुपये आरओ मेंटेनेंस और बोतलबंद पानी पर खर्च कर रहे हैं. प्राधिकरण पानी तो देता है लेकिन भरोसा नहीं देता.

नोएडा ग्रेटर नोएडा में पानी के टीडीएस बना नई चिंता

नोएडा के सेक्टर-22, 50, 62 और 63 जैसे पुराने सेक्टरों में रहने वाले लोगों का कहना है कि प्राधिकरण का सप्लाई किया गया पानी बिना RO के पीना संभव नहीं है. सेक्टर-62 निवासी अनिल वर्मा बताते हैं हमने टीडीएस मीटर से खुद पानी चेक किया जो कि 650 से ऊपर आया. मजबूरी में पूरा परिवार RO का पानी पीता है. नल का पानी सिर्फ नहाने और सफाई में जाता है.

कितने परिवार नहीं पी रहे नल का पानी

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में कुल मिलाकर करीब चार लाख से अधिक आवासीय परिवार रहते हैं. इनमें से स्थानीय आरडब्ल्यूए,सोसायटी,सेक्टरों में करीब लगभग 60 से 65 प्रतिशत परिवार सीधे नल का पानी पीने से बच रहे हैं. अनुमान के तौर पर ढाई लाख से अधिक परिवार या तो बोतलबंद पानी मंगा रहे हैं या फिर घरों में आरओ का इस्तेमाल कर रहे हैं. यह आंकड़ा केवल हाईराइज सोसायटियों का नहीं बल्कि सेक्टरों, कोठी इलाकों और ग्रेटर नोएडा वेस्ट तक फैला हुआ है.

जिम्मेदार कौन प्राधिकरण, बिल्डर या मेंटेनेंस

इस पूरे मामले में जिम्मेदारी को लेकर सबसे बड़ा भ्रम है. प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि नोएडा-ग्रेटर नोएडा में पानी की सप्लाई एक दम दुरस्त है. समय-समय पर बड़े पम्पो का मेंटेनेंस किया जाता है. हर एक पंप स्टेशन पर दो लोगों की जिम्मेदारी रहती है. रहा सवाल सोसायटी व कोऑपरेटिव सोसायटियों में सीधे तौर पर जो पानी छोड़ा जाता है उसकी पूरी जांच हर तीन महीने पर की जाती है. लेकिन आंतरिक पाइपलाइन की जिम्मेदारी बिल्डर और सोसायटी मेंटेनेंस के कर्मचारियों की होती है.

TDS के भरोसे सुरक्षित पानी का दावा

जल विभाग और प्राधिकरण के अधिकारियों का कहना है कि दूषित पानी की शिकायत मिलने पर सबसे पहले पानी का TDS लेवल मापा जाता है. यदि यह मानक के भीतर पाया जाता है, तो पानी को पीने योग्य मान लिया जाता है.लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि TDS केवल पानी में घुले ठोस पदार्थों की मात्रा बताता है. इससे यह नहीं पता चलता कि कि पानी में बैक्टीरिया ,वायरस, भारी धातुएं या रासायनिक प्रदूषक मौजूद हैं या नहीं.

ग्रेटर नोएडा और नोएडा वेस्ट की कई सोसाइटियों के निवासियों का आरोप है कि शिकायत करने पर अधिकतर मामलों में सिर्फ टैंक की सफाई या पाइपलाइन की मरम्मत कर मामला निपटा दिया जाता है जबकि पानी की पूरी जांच नहीं होती.

नमूने जाते हैं रिपोर्ट महीनों नहीं आती

भूजल विभाग के अधिकारियों के अनुसार पानी की गुणवत्ता जांच के लिए नमूने सहारनपुर,आगरा,झांसी और लखनऊ की प्रयोगशालाओं में भेजे जाते हैं.अधिशासी अभियंता विश्रजीत सिंह का कहना है कि हाल ही में कई सेक्टरों से नमूने जांच के लिए भेजे गए हैं,लेकिन उनकी रिपोर्ट अभी नहीं आई है.यही देरी लोगों के अविश्वास की सबसे बड़ी वजह बन रही है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जब तक रिपोर्ट आती है तब तक मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है और अगली शिकायत तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती.

नोएडा और ग्रेटर नोएडा के कई सेक्टरों में जलापूर्ति की पाइपलाइन 25 से 30 साल पुरानी बताई जा रही है. समय के साथ इन पाइपलाइनों में लीकेज,जंग और टूट-फूट की समस्या बढ़ती जा रही है.लोगो का कहना है कि पुरानी पाइपलाइन के कारण सीवर और पेयजल लाइन के मिलने की आशंका लगातार बनी रहती है,जिससे दूषित पानी घरों तक पहुंच सकता है.

प्रदूषण विभाग के अनुसार औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाले अपशिष्ट और नालों के पानी के नमूने नियमित रूप से जांच के लिए सैंपल भेजे जाते हैं. क्षेत्रीय प्रदूषण अधिकारी विकास मिश्रा बताते हैं कि नोएडा सेक्टर-1 और गाजियाबाद से भी नमूने प्रयोगशाला भेजे जाते हैं. और नियमों के उल्लंघन पर नोटिस जारी किए जाते हैं.हालांकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि कार्रवाई अधिकतर कागजों तक सीमित रहती है और जमीनी स्तर पर सुधार दिखाई नहीं देता.

भरोसे और हकीकत के बीच फंसी जल व्यवस्था

नोएडा ग्रेटर नोएडा की जलापूर्ति व्यवस्था आज TDS मशीन,लंबित रिपोर्टों और सीमित निगरानी के भरोसे चल रही है. शोधकर्ताओं की चेतावनी लोगों की मजबूरी और विभागीय दावों के बीच यह साफ है कि अगर समय रहते व्यापक ऑडिट,पारदर्शी जांच रिपोर्ट और पुरानी पाइपलाइनों का सुधार नहीं किया गया तो आने वाले समय में यह संकट और गहरा सकता है .यह सिर्फ पानी की कहानी नहीं है,यह जनस्वास्थ्य,प्रशासनिक जवाबदेही और शहर के भविष्य से जुड़ा सवाल है.

शोधकर्ताओं की चेतावनी भविष्य और भी खतरनाक

शोधकर्ताओं का साफ कहना है कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है. शोध टीम से जुड़े प्रोफेसर झुनझुनू माथुर के अनुसार ग्रेटर नोएडा के ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में कैंसर,किडनी फेल्योर,लिवर डिजीज और सांस से जुड़ी बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि क्रोमियम और कैडमियम जैसी भारी धातुएं शरीर की प्राकृतिक रोग-प्रतिरोधक प्रणाली को नुकसान पहुंचाती हैं और दीर्घकालिक बीमारियों का कारण बन सकती हैं.