‘महिला खुद ले सकती है निर्णय…’रेप पीड़िता के अर्बाशन के सवाल पर प्रयागराज कोर्ट का बड़ा फैसला

प्रयागराज की डिस्ट्रक्ट कोर्ट ने रेप पीड़िता के गर्भपात मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि महिला को अपने शरीर पर निर्णय लेने का पूरा अधिकार है, जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का अधिकार है. कोर्ट ने नाबालिग पीड़िता के गर्भपात की अनुमति देते हुए कहा कि उम्र के आधार पर इस अधिकार को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता, यह महिलाओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सशक्त करता है.

सांकेतिक तस्वीर Image Credit:

उत्तर प्रदेश में प्रयागराज की अदालत कोर्ट ने रेप पीड़िता के अबॉर्शन के मामले की सुनवाई करते हुए बड़ा फैसला दिया है. कोर्ट ने कहा कि कोई भी महिला अपनी बॉडी को लेकर खुद निर्णय ले सकती है. यह उसके निजता के अधिकार में शामिल है. ऐसे में नाबालिग का तर्क देकर बेवजह का प्रतिबंध लगाना उचित नहीं. इसी के साथ 16 वर्षीय रेप पीड़िता के मामले की सुनवाई करते हुए प्रयागराज की अदालत ने अर्बाशन की अनुमति दे दी है.

जिला अदालत में मामले की सुनवाई अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अंजू कनौजिया की कोर्ट में हुई. कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलील सुनने के बाद कड़ी टिप्पणी की. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 का जिक्र करते हुए कहा कि शरीर महिला का है और वह निजता के अधिकार के तहत वह अपने शरीर और प्रजनन संबंधी मामलों में निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है. हाई कोर्ट ने भी इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निजता के अधिकार का अभिन्न अंग करार दिया है.

7 महीने की है प्रेग्नेंसी

इस मामले में विशेष लोक अभियोजक सविता पाठक ने कोर्ट के समक्ष रेप पीड़िता की रिपोर्ट पेश की. बताया कि वह नाबालिग है और उसकी मेडिकल रिपोर्ट के मुताबिक वह करीब सात सप्ताह की प्रेग्नेट है. इस संबंध में प्रयागराज जिला महिला अस्पताल के रेडियोलॉजी एवं अल्ट्रासाउंड विभाग ने 19 मार्च 2026 को ही जांच के बाद जुड़वा गर्भ की पुष्टि की थी. इस रिपोर्ट में विभाग ने दोनों भ्रूण जीवित होने और स्वस्थ होने का दावा किया था.

प्रतिबंध लगाना निजता का हनन

अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश अंजू कनौजिया ने मामले की सुनवाई करते हुए नाबालिग के नाम पर प्रतिबंध लगाने को अनुचित माना. कहा कि कोई भी महिला विशेष रूप से बच्चों को जन्म देने के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निजता का का अधिकार रखती है. इसलिए नाबालिग के नाम पर उसके अधिकारों को प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता. यदि ऐसा होता है तो संविधान में मिले ये अधिकार निरर्थक हो जाएंगे. इस मामले में कोर्ट ने कहा कि जब पीड़िता के परिवार वालों ने प्रेग्नेंसी की जानकारी विवेचक को 9 मई 2026 को ही दे दी तो उनकी ओर से उसी समय अर्बाशन की कार्रवाई शुरू की गई. अब कोर्ट ने इस मामले में आगे की कार्रवाई के लिए चिकित्सा अधिकारियों को निर्देश दिए हैं.

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