पश्चिमी UP की सियासत में क्यों अहम हैं ‘कश्यप’, जिनको लेकर पुलिस पर आगबबूला हुईं इकरा हसन
कैराना से समाजवादी पार्टी (सपा) सांसद इकरा हसन सुर्खियों में हैं. आपने इकरा हसन का सहारनपुर पुलिस के साथ नोकझोक का वीडियो तो देखा होगा, लेकिन इसके पीछे की असल सियासत के बारे में हम आज आपको बताएंगे. आमतौर पर शांत, संतुलित और संयमित राजनीतिक शैली के लिए पहचानी जाने वाली इकरा हसन ने कश्यप समाज के युवक मोनू कश्यप की मौत के मामले में जिस तरह खुलकर मोर्चा संभाला, उसने पश्चिमी यूपी की सियासी तपिश को बढ़ा दिया है.
मोनू कश्यप की मौत के बाद शुरू हुआ यह विवाद अब केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक मायने भी निकाले जा रहे हैं. सांसद इकरा हसन का सीधे प्रशासनिक अधिकारियों से भिड़ना, डीआईजी कार्यालय पहुंचकर सवाल उठाना और बाद में सदर बाजार कोतवाली में धरने पर बैठना… इसके पीछे मुजफ्फरनगर, सहारनपुर और शामिल के कश्यप वोटर हैं, जो किसी को जिताने-हराने में अहम भूमिका निभाते हैं.
पहले मोनू कश्यप की मौत का मामला समझिए?
शामली जिले के जासाला गांव निवासी मोनू कश्यप की मौत के बाद परिवार लगातार न्याय की मांग कर रहा था. इसी सिलसिले में मृतक की मां के साथ सांसद इकरा हसन डीआईजी कार्यालय पहुंचीं. वहां प्रशासनिक व्यवहार को लेकर विवाद की स्थिति बन गई. आरोप लगाया गया कि मृतक परिवार और जनप्रतिनिधियों के साथ उचित व्यवहार नहीं किया गया. इसके बाद माहौल तनावपूर्ण हो गया. घटना के बाद पुलिस ने मांगेराम कश्यप समेत चार लोगों को हिरासत में लिया गया.
इसी कार्रवाई के विरोध में इकरा हसन सीधे सदर बाजार कोतवाली पहुंच गईं और धरने पर बैठ गईं. उन्होंने गिरफ्तार लोगों की रिहाई की मांग करते हुए पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाए. कई घंटे तक कोतवाली परिसर और आसपास का इलाका राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र बना रहा. बड़ी संख्या में समर्थक मौके पर जमा हो गए. नारेबाजी, पुलिस तैनाती और राजनीतिक हलचल के बीच रात करीब 10 बजे तक सड़क पर जाम जैसी स्थिति बनी रही.
राजनीतिक संदेश देना चाहती थीं इकरा
पूरे घटनाक्रम ने सहारनपुर और शामली के राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इकरा हसन का यह रुख केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी है. खासतौर पर कश्यप समाज के मुद्दे पर उनकी सक्रियता को समाजवादी पार्टी की PDA रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कश्यप समाज को पिछड़ा वर्ग की प्रभावशाली जातियों में माना जाता है.
पश्चिमी यूपी में क्या है ‘कश्यप समाज’ का रोल
सहारनपुर में इस समाज की आबादी करीब 2.75 लाख के आसपास बताई जाती है. वहीं शामली में लगभग 1.20 लाख और मुजफ्फरनगर में करीब 1.50 लाख कश्यप मतदाता माने जाते हैं/ इसके अलावा बिजनौर, मेरठ और आसपास के क्षेत्रों में भी इस समाज का प्रभाव कई विधानसभा सीटों पर निर्णायक माना जाता है. इसी वजह से भाजपा, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस समेत सभी दल ‘कश्यप समाज’ को अपने पक्ष में करने की कोशिश करते रहे हैं.
सपा की PDA रणनीति में कश्यप समाज पर फोकस
पंचायत चुनाव से लेकर 2027 विधानसभा चुनाव तक पिछड़े वर्ग की राजनीति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है. ऐसे में कश्यप समाज से जुड़े संवेदनशील मुद्दे पर इकरा हसन की सक्रियता को राजनीतिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है. दरअसल समाजवादी पार्टी इस समय अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण को मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है. अखिलेश याादव लगातार ऐसे मुद्दों को प्रमुखता से उठा रहे हैं.