संभल हिंसा केस में NSA पर SC सख्त, यूपी सरकार से पूछा ये सवाल
संभल हिंसा मामले में NSA के तहत निरुद्ध किए गए मुल्ला अफरोज को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कई तीखे सवाल किए हैं. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने पूछा कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA का आधार कैसे बनाया जा सकता है. कोर्ट ने आरोपी की गिरफ्तारी में 54 दिन की देरी, उपलब्ध CCTV फुटेज और डिलीट किए गए मोबाइल मैसेज को लेकर भी सवाल उठाए.
संभल हिंसा मामले में NSA के तहत हुई कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से कई तीखे सवाल पूछे हैं. सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया कि पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे के आधार पर किसी व्यक्ति को निवारक नजरबंदी यानी Preventive Detention में कैसे रखा जा सकता है? मामला नवंबर 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा है और आरोपी हैं मुल्ला अफरोज, जिन्हें इस हिंसा का कथित मास्टरमाइंड बताया गया है.
सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी में हुई 54 दिन की देरी, CCTV फुटेज और कथित डिलीट किए गए मोबाइल मैसेज को लेकर भी सवाल उठाए हैं. कोर्ट ने फिलहाल मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है.
NSA पर सुप्रीम कोर्ट के सवाल
नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और इसके बाद पुलिस कार्रवाई का सिलसिला शुरू हुआ. इसी हिंसा के कथित मास्टरमाइंड मुल्ला अफरोज को बाद में NSA यानी राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत निरुद्ध किया गया. अब इसी NSA कार्रवाई को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने यूपी सरकार के सामने कई सवाल रखे.
‘कबूलनामे’ पर कोर्ट का सवाल
सुप्रीम कोर्ट का सबसे बड़ा सवाल कथित पुलिस कस्टडी में दिए गए कबूलनामे को लेकर रहा. कोर्ट ने पूछा कि क्या पुलिस हिरासत में दिए गए कथित कबूलनामे को NSA के तहत निवारक नजरबंदी का आधार बनाया जा सकता है? दरअसल, आरोपी पक्ष का दावा है कि उसकी गिरफ्तारी पुलिस हिरासत में दिए गए एक कथित कबूलनामे के आधार पर हुई. यहीं कोर्ट ने पूछा कि NSA के लिए जरूरी प्रशासनिक संतुष्टि का आधार क्या सिर्फ ऐसा कबूलनामा हो सकता है?
‘NSA कोई मंत्र नहीं’
सुनवाई के दौरान जस्टिस दीपांकर दत्ता ने निवारक नजरबंदी के इस्तेमाल को लेकर भी सख्त टिप्पणी की. कोर्ट ने साफ किया कि NSA सजा देने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित खतरे को रोकने के लिए होती है, कोर्ट ने सवाल किया कि अगर पूरा डिटेंशन ऑर्डर कथित कबूलनामे पर आधारित है तो उसके पीछे पर्याप्त स्वतंत्र सामग्री क्या है? यानी सुप्रीम कोर्ट यह जांच रहा है कि NSA लगाने से पहले प्रशासन के पास ऐसा ठोस और विश्वसनीय आधार था या नहीं, जिससे भविष्य में सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरे की आशंका साबित हो.
54 दिन बाद गिरफ्तारी पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को घटना के 54 दिन बाद गिरफ्तार किए जाने पर भी सवाल उठाया. कोर्ट ने पूछा कि जब घटना के पहले दिन से CCTV फुटेज उपलब्ध था, तो आरोपी की गिरफ्तारी में इतना वक्त क्यों लगा? कोर्ट ने यह भी पूछा कि अगर CCTV मौजूद था, तो NSA के तहत नजरबंदी के आदेश में उसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया गया? यानी कोर्ट ने जांच के दौरान उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक सबूत और नजरबंदी के आधार के बीच भी सवाल खड़ा किया है.
डिलीट मैसेज पर भी सवाल
सुनवाई में मोबाइल फोन के मैसेज को लेकर भी कोर्ट ने यूपी सरकार से सवाल किया. राज्य की ओर से कहा गया कि आरोपी ने अपने मोबाइल से मैसेज डिलीट कर दिए थे, लेकिन दूसरी तरफ कथित एक मैसेज को आरोपी की गतिविधियों के सबूत के तौर पर भी पेश किया गया. इस पर कोर्ट ने पूछा कि अगर मैसेज डिलीट कर दिए गए थे, तो वह कथित मैसेज पुलिस के पास आया कैसे? यानी कोर्ट ने राज्य के तर्क में दिखाई दे रहे इस विरोधाभास को भी नोट किया.
सरकार की दलील क्या है?
यूपी सरकार की तरफ से NSA की कार्रवाई का बचाव किया गया. राज्य का तर्क था कि उपलब्ध सामग्री से आरोपी की ओर से भविष्य में हिंसा करने या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित करने की संभावना सामने आती है. सरकार ने कहा कि अगर किसी व्यक्ति से भविष्य में हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे की आशंका साबित होती है तो निवारक नजरबंदी की कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन कोर्ट ने सवाल किया कि इस आशंका के पीछे ठोस सामग्री और वास्तविक आधार क्या है.
अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नजर
मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल आदेश सुरक्षित रख लिया है. इसका मतलब है कि अदालत अब यह तय करेगी कि मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA के तहत की गई निवारक नजरबंदी कानून की कसौटी पर खरी उतरती है या नहीं. यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि इसमें यह सवाल सामने है कि किस तरह की सामग्री निवारक नजरबंदी के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है और पुलिस हिरासत में कथित कबूलनामे की भूमिका कितनी हो सकती है.