संतकबीरनगर में डीजल संकट से किसान बेहाल, पेट्रोल पंप खाली; प्रशासन के आदेश हवा-हवाई
संतकबीरनगर में भीषण गर्मी और खेती के सीजन में किसानों को डीजल की किल्लत सता रही है. जिले के पेट्रोल पंपों पर डीजल नदारद है, जिससे किसान सिंचाई और कृषि कार्यों के लिए भटक रहे हैं. जिला प्रशासन और आपूर्ति अधिकारी के 'सख्त आदेश' जमीनी हकीकत पर हवा-हवाई साबित हो रहे हैं.
संतकबीर नगर में पेट्रोल पंपों के मैनेजमेंट को बेहतर बनाने और कालाबाजारी रोकने के लिए प्रशासन और जिला पूर्ति अधिकारी के सख्त आदेश ज़मीन पर पूरी तरह हवा-हवाई साबित हो रहे हैं. कागजों पर बड़े-बड़े नियम और राशनिंग बनाने वाले जिम्मेदार अधिकारियों के दावों की पोल तब खुल गई जब कई पेट्रोल पंपों पर डीजल पूरी तरह गायब मिला.
भीषण गर्मी और खेती के इस पीक सीजन में डीजल न मिलने से किसानों में हाहाकार मचा हुआ है. जिला प्रशासन की व्यवस्थाएं पूरी तरह फेल है. जिस पेट्रोल पंप पर इस समय ट्रैक्टरों की लंबी कतारें होनी चाहिए थीं, वहां पूरी तरीके से सन्नाटा पसरा हुआ है. पंप पर न तो डीजल उपलब्ध है और न ही पेट्रोल. किसान भारी मायूसी के साथ खाली हाथ लौट रहे हैं.
फसलें सूखने की कगार पर, और अन्नदाता बेबस
जिले में हैसर बाजार से लेकर रूपिन तक पेट्रोल पंप पर यही हालात हैं. जल की तलाश में भटक रहे किसान ने अपना दर्द बयां करते हुए बताया, इस समय खेती का सीजन चल रहा है. मैं एक-दो नहीं, बल्कि पांच-पांच पेट्रोल पंपों के चक्कर काट कर आ रहा हूं, लेकिन कहीं भी डीजल नहीं मिला. फसलें सूखने की कगार पर हैं, और अन्नदाता बेबस महसूस कर रहे हैं.
कमोबेश यही हाल बंडा बाजार, मलौली, धनघटा और पौली क्षेत्र के पंपों का भी है, जहां डीजल के नोजल पूरी तरह सूखे पड़े हैं. इस समय ग्रामीण इलाकों में सिंचाई और कृषि कार्यों के लिए डीजल की सबसे ज्यादा आवश्यकता है. पंपों पर घंटों लाइन में लगने और कई-कई किलोमीटर भटकने के बाद भी तेल न मिलने से किसानों की फसलें सूखने की कगार पर हैं.
आदेश जमीनी स्तर पर क्यों लागू नहीं हो रहे हैं?
किसानों का कहना है कि एक तरफ मौसम की मार है और दूसरी तरफ प्रशासन का यह निकम्मा सिस्टम, जिसने उन्हें पूरी तरह बेबस कर दिया है. क्षेत्रीय जनता और किसानों का सीधा सवाल है कि कुछ दिन पूर्व जिला पूर्ति अधिकारी ने जो बकायदा नोटिस जारी कर नियम तय किए थे, वो आदेश जमीनी स्तर पर क्यों लागू नहीं हो पा रहे हैं?
जब कंपनियों और पंपों के पास डीजल का स्टॉक ही नहीं है, तो फिर इन कागजी नियमों और राशनिंग का क्या औचित्य है? क्या अधिकारी सिर्फ अपनी पीठ थपथपाने के लिए वातानुकूलित (AC) कमरों में बैठकर आदेश जारी करते हैं? अब देखना यह होगा कि इस गंभीर संकट और किसानों की बेबसी को देखने के बाद क्या जिला प्रशासन की सप्लाई बहाल होती है?