बजाई शहनाई, इंद्र को रिझाने के लिए गाया मेघ राग; भीषण गर्मी से राहत के लिए काशी में अनोखा अनुष्ठान

भीषण गर्मी से बेहाल काशी में इंद्र देव को रिझाने के लिए अनोखा अनुष्ठान किया गया. पंडित महेंद्र प्रसन्ना की टीम ने रीवा घाट पर शहनाई पर 'मेघ राग' बजाया और गंगा पूजन किया. यह अनुष्ठान शास्त्रीय संगीत व कला के माध्यम से वर्षा की कामना करने की काशी की प्राचीन परंपरा को दर्शाता है, ताकि भीषण गर्मी से राहत मिल सके.

इंद्र को रिझाने के लिए काशी के घाट पर बजी शहनाई

ज्येष्ठ-आषाढ़ की तपती दुपहरी और प्रचंड गर्मी से बेहाल काशीवासियों ने राहत के लिए इंद्र देव को रिझाने की कोशिश की है. इसके लिए धर्मनगरी में एक अनूठा और सांस्कृतिक अनुष्ठान किया है. एक ओर जहां काशी के गंगा तटों पर वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ और पवित्र स्नान का दौर चल रहा है, वहीं दूसरी ओर बादलों के देवता भगवान इंद्र को प्रसन्न करने के लिए संगीत के सुर भी सजाए जा रहे हैं.

मान्यता है कि जब इंसान की प्रार्थना में सुरों का तालमेल होता है तो देवता भी पिघल जाते हैं. इसी आस के साथ सुर-सरिता के माध्यम से काशी को झुलसाने वाली गर्मी से निजात दिलाने की प्रार्थना की जा रही है. इसी क्रम में ​काशी के ऐतिहासिक रीवा घाट पर आज सुबह-सवेरे एक अद्भुत और अलौकिक दृश्य देखने को मिला. काशी विश्वनाथ मंदिर के शहनाई वादक पंडित महेंद्र प्रसन्ना और उनकी पूरी टीम ने इस विशेष अनुष्ठान का बीड़ा उठाया.

गंगा मइया को चढाई पीयरी

गंगा पूजन और वंदन के पश्चात् अनुष्ठान की शुरुआत मां गंगा के विधि-विधान से पूजन-अर्चन के साथ हुई. कलाकारों ने मां गंगा को पारंपरिक ‘पीयरी’ (पीला वस्त्र) अर्पित कर उनका वंदन किया. इसी के साथ लोक-कल्याण की कामना की. ​राग ‘मेघ’ से बादलों को आमंत्रित किया गया. वैदिक काल से ही मान्यता है कि शास्त्रीय संगीत के कुछ रागों में प्रकृति को बदलने की शक्ति होती है. इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए पंडित महेंद्र प्रसन्ना ने अपनी शहनाई पर राग मेघ को साधा.

​”इंद्र बरसो रे काशी नगरिया…” से पूर्णाहूति

​राग मेघ के शास्त्रीय वादन के बाद टीम ने क्लासिकल संगीत और पारंपरिक भजनों की झड़ी लगा दी. शहनाई की जादुई धुन पर जब लोक-भावनाओं को समेटे हुए भजन गूंजे. इससे घाट का पूरा माहौल भक्तिमय हो उठा. दरअसल जब-जब काशी पर कोई संकट या प्राकृतिक आपदा (जैसे भीषण गर्मी या सूखा) आती है, तब यहां के कलाकार और विद्वान अपनी कला को ही ईश्वर की आराधना का माध्यम बना लेते हैं. रीवा घाट पर हुआ यह आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि आज भी काशी की रगों में बाबा बिस्मिल्लाह खान की शहनाई और शास्त्रीय परंपराएं जिंदा हैं.

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