मनुस्मृति की समीक्षा करेगा काशी विद्वत परिषद, हटाए जाएंगे क्षेपक श्लोक और मनगढ़ंत तथ्य

मनुस्मृति को लेकर जारी बहस के बीच श्री काशी विद्वत परिषद ने ग्रंथ के प्रामाणिक स्वरूप की समीक्षा का फैसला किया है. परिषद 11 सदस्यीय समिति गठित कर प्राचीन पांडुलिपियों और विभिन्न संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन कराएगी. इसका उद्देश्य कथित क्षेपक या बाद में जोड़े गए श्लोकों की पहचान करना है. परिषद के महामंत्री प्रो. राम नारायण द्विवेदी के मुताबिक, देश के संस्कृत संस्थानों और पांडुलिपि संग्रहों के साथ विदेशों में उपलब्ध सामग्री का भी अध्ययन किया जाएगा.

मनुस्मृति को लेकर देश में बहस जारी

मनुस्मृति को लेकर देश में जारी बहस के बीच श्री काशी विद्वत परिषद ने इसके प्रामाणिक स्वरूप की समीक्षा करने का फैसला किया है. परिषद का कहना है कि मनुस्मृति में बाद के दौर में जोड़े गए कथित क्षेपक श्लोकों और मनगढ़ंत अंशों की पहचान की जाएगी और उन्हें मूल ग्रंथ से अलग किया जाएगा. इसके लिए देश के प्रमुख धर्मशास्त्रियों और वेदाचार्यों की एक समिति गठित किए जाने की तैयारी है.

मनुस्मृति को लेकर यह फैसला दिल्ली में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में लिया गया. बैठक में आठ आचार्य, महामंडलेश्वर और विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संगठनों से जुड़े विद्वान शामिल हुए. बैठक में श्री काशी विद्वत परिषद, अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, अखिल भारतीय संत समिति और गंगा महासभा समेत कई संगठनों के प्रतिनिधियों ने मनुस्मृति की प्रामाणिकता और उसमें समय-समय पर हुए कथित संशोधनों की विस्तृत समीक्षा का निर्णय लिया.

इस पूरे मामले को आगामी 2 से 5 नवंबर तक वाराणसी के रुद्राक्ष कन्वेंशन सेंटर में प्रस्तावित ‘संस्कृति संसद’ से भी जोड़कर देखा जा रहा है. आयोजकों के मुताबिक, चार दिवसीय आयोजन में देश-विदेश से सनातन परंपरा से जुड़े विद्वान और प्रतिनिधि शामिल होंगे. आयोजन के पहले दिन प्रस्तावित ‘हिंदू आचार संहिता’ को भी सामने रखने की तैयारी है.

11 सदस्यीय समिति करेगी मनुस्मृति की समीक्षा

श्री काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी के मुताबिक, मनुस्मृति की समीक्षा के लिए परिषद के मार्गदर्शन में देश के प्रमुख धर्मशास्त्रियों और शीर्ष वेदाचार्यों की 11 सदस्यीय समिति गठित की जाएगी. उन्होंने बताया कि समिति अंग्रेजी शासन से पहले की भारतीय सामाजिक व्यवस्था और उपलब्ध प्राचीन पांडुलिपियों का अध्ययन करेगी. इसके लिए देशभर के पुस्तकालयों, संस्कृत संस्थानों और पांडुलिपि संग्रहों में मौजूद सामग्री का अध्ययन किया जाएगा.

परिषद का दावा है कि इस प्रक्रिया के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जाएगी कि मनुस्मृति के कौन से अंश प्राचीन मूल पाठ का हिस्सा हैं और किन अंशों को बाद में जोड़े जाने की संभावना है.

क्यों जरूरत पड़ी मनुस्मृति की समीक्षा की?

प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी का कहना है कि मनुस्मृति सनातन परंपरा के महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक है, लेकिन इसके कुछ अंशों को लेकर लंबे समय से विवाद होता रहा है. उनके मुताबिक, मनुस्मृति के मूल स्वरूप और बाद के संस्करणों में अंतर को समझने के लिए प्राचीन पांडुलिपियों का तुलनात्मक अध्ययन जरूरी है. परिषद का आरोप है कि औपनिवेशिक काल में मनुस्मृति की व्याख्या के दौरान कुछ ऐसे अंशों को महत्व मिला, जिन्हें वह बाद में जोड़े गए ‘क्षेपक’ मानती है.

हालांकि, इन दावों की ऐतिहासिक और पाठ-संबंधी पुष्टि के लिए विशेषज्ञों द्वारा मूल पांडुलिपियों और विभिन्न संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाना महत्वपूर्ण होगा.

विलियम जोन्स की भूमिका पर भी सवाल

मनुस्मृति के अंग्रेजी अनुवाद और अध्ययन के संदर्भ में ब्रिटिश विद्वान सर विलियम जोन्स का नाम भी चर्चा में है. जोन्स ने 1794 में मनुस्मृति का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित किया था, जिसे उन्होंने The Institutes of Hindu Law: or, The Ordinances of Manu के रूप में प्रस्तुत किया था.

प्रोफेसर द्विवेदी का आरोप है कि औपनिवेशिक दौर में मनुस्मृति की व्याख्या को इस तरह प्रस्तुत किया गया, जिससे हिंदू समाज में विभाजन बढ़ा. उनका कहना है कि परिषद अब मूल पांडुलिपियों के आधार पर इस बात की जांच करना चाहती है कि कौन से श्लोक वास्तव में प्राचीन पाठ का हिस्सा हैं.

चीन और दक्षिण भारत की पांडुलिपियों का दावा

प्रोफेसर राम नारायण द्विवेदी के मुताबिक, परिषद मनुस्मृति की प्राचीन पांडुलिपियों की तलाश भारत के अलावा विदेशों में भी कर रही है. उन्होंने दावा किया कि चीन में मनुस्मृति से संबंधित कुछ प्राचीन पांडुलिपियां मिली हैं, जबकि दक्षिण भारत में भी कुछ पांडुलिपियों की जानकारी सामने आई है. इनका विस्तृत अध्ययन किया जा रहा है. उन्होंने कहा कि देश के कई संस्कृत विश्वविद्यालय और धर्म-दर्शन से जुड़े संस्थान इस शोध कार्य में सहयोग कर रहे हैं.

‘मनुस्मृति को नए सिरे से नहीं लिखा जाएगा’

मनुस्मृति की समीक्षा को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या परिषद इस ग्रंथ को नए सिरे से लिखने की तैयारी कर रही है? इस पर प्रोफेसर द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि परिषद का ऐसा कोई उद्देश्य नहीं है. उनका कहना है कि मनु और मनुस्मृति उनके लिए आदरणीय हैं और परिषद ग्रंथ को खारिज करने या उसका नया संस्करण लिखने नहीं जा रही है. परिषद का उद्देश्य केवल उन अंशों की पहचान करना है, जिन्हें वह बाद में जोड़े गए या प्रक्षिप्त मानती है.

नारी सम्मान और विवादित श्लोकों पर भी बहस

उन्होंने कहा कि परिषद ‘मनुस्मृति से विलियम जोन्स को खारिज’ करने और कथित क्षेपक श्लोकों की पहचान करने की दिशा में काम करेगी. प्रोफेसर द्विवेदी का कहना है कि मनुस्मृति में नारी सम्मान से जुड़े विचार भी मिलते हैं और कुछ ऐसे अंश भी हैं जिन्हें लेकर सवाल उठाए जाते हैं. परिषद का तर्क है कि यदि किसी ग्रंथ में परस्पर विरोधी विचार दिखाई देते हैं तो उनके पाठ-इतिहास और प्रामाणिकता की जांच की जानी चाहिए.

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