पति के अंतिम संस्कार के लिए पत्नी ने आने से कर दिया इनकार, तो मुस्लिमों ने मजहबी दीवारें तोड़ दी अंतिम विदाई
मुरादाबाद के तेजपाल का पारिवारिक कलह के कारण पत्नी और इकलौती बेटी से संबंध टूट गया था. ऐसे समय में आसिफ नामक व्यक्ति और उनके परिवार ने तेजपाल को सहारा दिया था. पिछले 15 वर्षों से आसिफ का परिवार बिना किसी स्वार्थ के उनके भोजन और दवाइयों का ख्याल रख रहा था. अब तेजपाल की मृत्यू पर जब उनके परिजनों ने आने से इनकार किया तो आसिफ और मुस्लिम समाज के अन्य युवकों ने ही उनका अंतिम संस्कार कराया.
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जनपद के अगवानपुर नगर पंचायत से सांप्रदायिक सौहार्द की एक ऐसी भावुक कहानी सामने आई है. इसने समाज में गिरते मानवीय मूल्यों के बीच एक नई उम्मीद जगाई है. सिविल लाइन थाना इलाके के अगवनपुर के 76 वर्षीय तेजपाल सिंह के निधन के बाद, जब उनके सगे संबंधियों ने मुख मोड़ लिया है, तब स्थानीय मुस्लिम समुदाय और हिंदू युवाओं ने मिलकर न केवल उनकी अंतिम विदाई का की, बल्कि गंगा-जमुनी तहजीब को जिंदा किया है,
जनपद बिजनौर मूल के तेजपाल, जो कभी पेपर मिल में इलेक्ट्रीशियन थे, 1997 में एक हादसे के बाद दिव्यांग हो गए थे. इसके बाद उनकी जिंदगी में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था. पारिवारिक कलह के कारण पत्नी और इकलौती बेटी से संबंध टूट गए और वे पूरी तरह अकेले हो गए थे. ऐसे समय में आसिफ नामक व्यक्ति और उनके परिवार ने तेजपाल को सहारा दिया था. पिछले 15 वर्षों से आसिफ का परिवार बिना किसी स्वार्थ के उनके भोजन और दवाइयों का ख्याल रख रहा था.
पत्नी ने तलाक का हवाला देते हुए आने से कर दिया मना
तेजपाल का देहांत हुआ तो पुलिस ने उनकी पूर्व पत्नी और पैतृक गांव बिजनौर में सूचना दी थी. लेकिन मृतक की पत्नी ने तलाक का हवाला देते हुए आने से इनकार कर दिया था. ऐसे में अगवानपुर के मुस्लिम भाइयों ने चंदा इकट्ठा कर अंतिम संस्कार की सामग्री जुटाई और हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार उनकी अर्थी को कंधा देकर श्मशान घाट न होने की बाधा के बावजूद, रामगंगा किनारे एक युवक मोनू ने मुखाग्नि दी है. मुरादाबाद घटना साबित करती है कि मजहब से ऊपर उठकर मानवता का धर्म ही सबसे बड़ा है.
15 साल का निस्वार्थ रिश्ता और आखिरी इच्छा
तेजपाल सिंह और आसिफ के बीच का रिश्ता साल 2011 में शुरू हुआ था, जब तेजपाल ने अपना घर आसिफ को बेच दिया था. घर बेचने के बाद वे कुछ समय बाहर रहे थे, लेकिन यादें उन्हें वापस उस मकान पर खींच लाई थी. तेजपाल ने आसिफ से उसी घर में आखिरी सास तक रहने की इच्छा जताई और कहा कि उनकी अंतिम यात्रा इसी चौखट से निकले. आसिफ ने दरियादिली दिखाते हुए न केवल उन्हें रहने की जगह दी, बल्कि अपने बच्चों को उनकी सेवा में लगा दिया था. आसिफ का दस वर्षीय बेटा अमान रोज उनके लिए खाना लेकर जाता था,.
लोगों ने इलाके में शमशान घाट बनवाने की मांग
इस मार्मिक विदाई के बीच अगवानपुर की एक बड़ी समस्या भी उजागर हुई है. स्थानीय निवासियों और रामलीला कमेटी के पदाधिकारियों ने गहरा रोष व्यक्त किया कि कस्बे में हिंदू समाज के लिए कोई व्यवस्थित श्मशान घाट नहीं है. तेजपाल सिंह के अंतिम संस्कार के दौरान भी लोगों को उबड़-खाबड़ जमीन और गड्ढों के बीच क्रिया-कर्म करना पड़ा है. लोगों का आरोप है कि इलाके में सरकारी भूमि पर अवैध कब्जे तो बहुत हैं, लेकिन श्मशान के लिए जमीन आवंटित नहीं की जा रही है.