Exclusive: सपा से 120 सीट मांगेगी कांग्रेस, इस बार प्रत्याशियों को नहीं मिलेगा फंड
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन की सुगबुगाहट तेज हो गई है. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस इस बार सपा से 115 से 120 विधानसभा सीटें मांग सकती है. पार्टी 2024 लोकसभा चुनाव में गठबंधन के प्रदर्शन को इसका आधार मान रही है. दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे पर औपचारिक बातचीत सितंबर के अंत में शुरू होने की संभावना है. कांग्रेस दलित, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी वोटरों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर अंदरखाने तैयारियां शुरू हो गई हैं. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस इस बार सपा से 115 से 120 विधानसभा सीटों की मांग करने की तैयारी में है. 403 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस का यह दावा 2017 के मुकाबले करीब 10 से 15 सीट ज्यादा है.
कांग्रेस का मानना है कि बदलते राजनीतिक समीकरण और 2024 लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को देखते हुए पार्टी को गठबंधन में सम्मानजनक सीट हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, दोनों दलों के बीच सीट बंटवारे को लेकर औपचारिक बातचीत सितंबर के अंत में शुरू हो सकती है.
2017 का फॉर्मूला, लेकिन इस बार कांग्रेस की ज्यादा सीटों पर नजर
कांग्रेस के अंदरखाने 2017 के विधानसभा चुनाव का उदाहरण दिया जा रहा है. उस समय समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने गठबंधन किया था. कांग्रेस ने 105 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि समाजवादी पार्टी 311 सीटों पर मैदान में उतरी थी. हालांकि गठबंधन को चुनाव में करारी हार का सामना करना पड़ा था. भाजपा ने 312 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, जबकि सपा 47 और कांग्रेस महज सात सीटों पर सिमट गई थी.
कांग्रेस के रणनीतिकारों का तर्क है कि उस समय कांग्रेस के पास देशभर में सिर्फ 44 लोकसभा सांसद थे और उत्तर प्रदेश में पार्टी के केवल दो सांसद थे. अब राजनीतिक स्थिति बदल चुकी है. कांग्रेस के पास लोकसभा में 99 सांसद हैं और उत्तर प्रदेश से उसके छह सांसद हैं. ऐसे में पार्टी का मानना है कि पिछली बार के मुकाबले उसे 10 से 15 सीट ज्यादा मिलनी चाहिए.
2024 के लोकसभा चुनाव ने बढ़ाया कांग्रेस का आत्मविश्वास
कांग्रेस की सीटों की मांग के पीछे 2024 लोकसभा चुनाव का प्रदर्शन भी बड़ी वजह माना जा रहा है. यूपी में सपा और कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था और दोनों दलों ने मिलकर 80 में से 43 सीटें जीती थीं. समाजवादी पार्टी ने 62 सीटों पर चुनाव लड़कर 37 सीटें जीतीं, जबकि कांग्रेस ने 17 सीटों पर चुनाव लड़कर छह सीटों पर जीत दर्ज की. भाजपा को इस चुनाव में बड़ा नुकसान हुआ और पार्टी 2019 के मुकाबले 29 सीटें गंवाकर 33 सीटों पर सिमट गई.
दलित, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी वोट पर नजर
कांग्रेस का मानना है कि 2024 में गठबंधन की सफलता के पीछे दलित, अल्पसंख्यक और गैर-यादव ओबीसी मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण रही. पार्टी अब इन्हीं सामाजिक समूहों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. सूत्रों का दावा है कि कांग्रेस खुद को इन वर्गों के बीच विपक्ष की बड़ी ताकत के तौर पर पेश करना चाहती है. वहीं समाजवादी पार्टी का मुख्य आधार यादव और मुस्लिम मतदाताओं के बीच माना जाता है.
राम मंदिर दान मामले को भी चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी
ऐसे में कांग्रेस और सपा मिलकर ऐसा सामाजिक समीकरण तैयार करना चाहती हैं, जिसमें भाजपा के खिलाफ अलग-अलग सामाजिक समूहों के वोटों को एकजुट किया जा सके. सूत्रों के मुताबिक, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी आगामी चुनाव प्रचार में अयोध्या के राम मंदिर से जुड़े कथित दान गबन के मामले को भी मुद्दा बना सकती हैं. विपक्ष इस मुद्दे को धार्मिक भावनाओं और पारदर्शिता से जोड़कर जनता के बीच ले जाने की तैयारी में है.
कांग्रेस की नई रणनीति- उम्मीदवारों को नहीं मिलेगा बड़ा फंड
इसके अलावा पेपर लीक, युवाओं के रोजगार, आरक्षण और विश्वविद्यालयों से जुड़े मुद्दों को भी विपक्ष चुनावी अभियान का हिस्सा बना सकता है. गठबंधन और सीटों की बातचीत के बीच कांग्रेस की चुनावी रणनीति में एक बड़ा बदलाव भी सामने आया है. सूत्रों के मुताबिक, इस बार पार्टी अपने विधानसभा उम्मीदवारों को सीधे तौर पर बड़ा चुनावी फंड देने के मूड में नहीं है. पार्टी की योजना उम्मीदवारों को मुख्य रूप से प्रचार सामग्री उपलब्ध कराने की है.
पार्टी के अंदर प्रस्तावित व्यवस्था के मुताबिक टिकट के दावेदारों को अपने बैंक खाते में कम से कम 20 लाख रुपये का बैलेंस दिखाना पड़ सकता है. इसके अलावा पार्टी फंड के तौर पर करीब 2 लाख रुपये जमा कराने की शर्त भी रखे जाने की तैयारी है. हालांकि, किसी सीट पर मजबूत और जिताऊ उम्मीदवार होने की स्थिति में पार्टी इस नियम में बदलाव कर सकती है.
पिछली बार 25 से 75 लाख तक दिया था फंड
कांग्रेस की इस रणनीति को पिछले विधानसभा चुनावों की तुलना में बड़ा बदलाव माना जा रहा है. सूत्रों के मुताबिक, पिछली बार पार्टी ने अपने उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने के लिए करीब 25 लाख से 75 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद उपलब्ध कराई थी. इस बार पार्टी खुद आर्थिक बोझ कम करने और ऐसे उम्मीदवारों को टिकट देने की कोशिश में है जो चुनाव लड़ने के लिए आर्थिक रूप से सक्षम हों.
सभी 403 सीटों पर संगठन तैयार करने की कोशिश
पार्टी सूत्रों का दावा है कि इसका उद्देश्य ऐसे लोगों को टिकट की दौड़ से बाहर करना भी है जो सिर्फ चुनाव लड़कर आर्थिक लाभ हासिल करने की सोच रखते हैं. हालांकि कांग्रेस सपा के साथ गठबंधन की तैयारी कर रही है, लेकिन पार्टी संगठन स्तर पर प्रदेश की सभी 403 विधानसभा सीटों पर तैयारी कर रही है. ‘संगठन सृजन’ जैसे अभियानों के जरिए पार्टी बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने की कोशिश कर रही है.
पार्टी का मानना है कि गठबंधन की स्थिति में भी मजबूत संगठन होने पर सीट बंटवारे में उसकी बार्गेनिंग पॉवर बढ़ेगी. यानी कांग्रेस एक तरफ सपा के साथ गठबंधन की जमीन तैयार कर रही है, तो दूसरी तरफ सभी सीटों पर अपनी तैयारी बनाए रखकर दबाव की राजनीति भी कर रही है.
2022 की हार से सबक, अकेले लड़ने की रणनीति से दूरी
2022 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में अकेले चुनाव लड़ा था. प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में पार्टी ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान चलाया था. कांग्रेस ने करीब 399 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, लेकिन पार्टी को केवल दो सीटों पर जीत मिली. उसका वोट शेयर भी बेहद सीमित रहा. इसके बाद 2024 लोकसभा चुनाव में सपा के साथ गठबंधन ने कांग्रेस को छह लोकसभा सीटें दिलाईं. यही वजह है कि कांग्रेस अब 2027 में अकेले चुनाव लड़ने के बजाय सपा के साथ गठबंधन को ज्यादा प्रभावी विकल्प मान रही है.
सीटों पर आखिरी फैसला आसान नहीं
हालांकि कांग्रेस की ओर से 115 से 120 सीटों का दावा सामने आया है, लेकिन सपा इतनी बड़ी संख्या में सीटें देने को तैयार होगी या नहीं, यह अभी स्पष्ट नहीं है. 2022 विधानसभा चुनाव में सपा ने 347 सीटों पर चुनाव लड़ा था और 111 सीटें जीती थीं. वहीं भाजपा ने 255 सीटों पर जीत हासिल की थी. ऐसे में 2027 के लिए सीटों का बंटवारा दोनों दलों के बीच सबसे बड़ी चुनौती हो सकता है.
कांग्रेस अपनी 2024 की सफलता, राहुल गांधी की सक्रियता और दलित-अल्पसंख्यक-गैर यादव ओबीसी समीकरण को आधार बनाकर ज्यादा सीटें मांग रही है. वहीं सपा के लिए अपने मजबूत विधानसभा क्षेत्रों को छोड़ना आसान नहीं होगा. अब देखना यह होगा कि सितंबर के अंत में शुरू होने वाली संभावित बातचीत में कांग्रेस की 115-120 सीटों की मांग कितनी दूर तक जाती है और अखिलेश यादव की पार्टी गठबंधन में कांग्रेस को कितनी सीटें देने पर राजी होती है.
(रिपोर्ट- कुमार विक्रांत)
