अवैध हिरासत पर SC के फैसलों ने पैंडोरा बॉक्स खोल दिया है- इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिकाओं के दुरुपयोग पर चिंता जताई है. कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं केवल जांच पूरी होने तक ही स्वीकार्य हैं. चार्जशीट और संज्ञान के बाद अवैध हिरासत को चुनौती नहीं दी जा सकती है. साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों बाध्यकारी नहीं माना.

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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चिंता जताई है कि कई आरोपी अपनी जमानत याचिकाएं खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट तक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर कर हिरासत को चुनौती दे रहे हैं. हाईकोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं केवल जांच पूरी होने तक ही स्वीकार्य हैं. चार्जशीट और संज्ञान के बाद अवैध हिरासत को चुनौती नहीं दी जा सकती है.

नीरज बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में जस्टिस सिद्धार्थ और जज विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने कहा कि ऐसे आरोपी सर्वोच्च न्यायालय के हालिया निर्णयों पर भरोसा कर रहे हैं, जिनमें कहा गया है कि आरोपी की हिरासत में प्रारंभिक त्रुटि अपूरणीय है और मौलिक अधिकारों को मामले के किसी भी चरण में लागू किया जा सकता है.

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बाध्यकारी नहीं माना

खंडपीठ ने कहा कि स्थिति अराजक है और यदि इसे जारी रहने दिया गया, तो आरोपी जांच या मुकदमे के किसी भी चरण में भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत अपने मौलिक अधिकारों का दावा करने के लिए मनमाने ढंग से बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं दायर करते रहेंगे. साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को बाध्यकारी नहीं माना.

खंडपीठ ने कहा कि आरोपियों के प्रारंभिक गिरफ्तारी को चुनौती देने के अधिकार पर किसी प्रकार की रोक न होने के कारण, एक तरह से पैंडोरा बॉक्स खोल दी गई है. और याचिकाएं आरोपपत्र पर संज्ञान लेने, आरोप तय करने और धारा 209 और 309 सीआरपीसी के तहत रिमांड आदेशों के बाद और साथ ही मुकदमे की सुनवाई के दौरान भी दायर की जा रही हैं.

सर्वोच्च न्यायालय के दो अलग-अलग फैसले हैं

हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने गिरफ्तारी, रिमांड और अवैध हिरासत के प्रश्न पर सर्वोच्च न्यायालय के दो अलग-अलग फैसले हैं. पुराने फैसलों में कहा गया है कि जहां किसी व्यक्ति को ऐसे आदेश के आधार पर जेल हिरासत में भेजा जाता है जो अधिकार क्षेत्र से बाहर या पूरी तरह से अवैध है, वहां बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका नहीं दी जा सकती है.

दूसरे निर्णयों ने हिरासत में लिए गए व्यक्तियों के लिए जांच या मुकदमे के किसी भी चरण में न्यायालयों में जाकर यह दावा करने के लिए सारे द्वार खोल दिए हैं कि उनका प्रारंभिक रिमांड आदेश अवैध था. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करने के अधिकार पर कोई रोक नहीं लगाई गई है. वह जांच/मुकदमे के किसी भी चरण में रिमांड आदेश को अवैध बता सकता है.

गिरफ्तारी के दो साल बाद हिरासत को दी थी चुनौति

खंडपीठ ने कहा कि विहान कुमार और अन्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के दो निर्णयों में असंगत विचारों के कारण विचित्र स्थिति का सामना कर रहे हैं. हाईकोर्ट ने ये टिप्पणियां दहेज हत्या और अपनी पत्नी और एक वर्षीय बेटी की हत्या के आरोपी एक व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए कीं. जिसको निचली अदालत ने पहले ही बरी कर दिया था.

वहीं, गिरफ्तारी के दो साल बाद उसने अपनी हिरासत को चुनौती दी और आरोप लगाया कि यह अवैध थी, क्योंकि पुलिस और रिमांड मजिस्ट्रेट द्वारा उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था. खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि एक बार आरोपपत्र पर संज्ञान का आदेश पारित हो जाने के बाद, रिमांड आदेश में प्रारंभिक अवैधता को चुनौती देने का अधिकार लागू नहीं हो सकता है.

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