चढ़ावा चोरी: राम मंदिर में श्रद्धालुओं की जेब से निकलकर बैंक तक कैसे पहुंचती है दान राशि? ये है पूरा सिस्टम

अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के विवाद के बीच, यह लेख दान राशि के प्रबंधन की पूरी प्रक्रिया समझाता है. दानपात्रों से बैंक खाते तक, एसबीआई और सीसीटीवी की निगरानी में पूरी व्यवस्था अत्यंत पारदर्शी और सुरक्षित बनाई गई है. लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन दान करते हैं, जिनकी गिनती सख्त नियमों और बहुस्तरीय सत्यापन के साथ की जाती है, ताकि हर दान सुरक्षित रूप से मंदिर कोष में जमा हो.

प्रतीकात्मक तस्वीर Image Credit: AI Generated

अयोध्या में भगवान श्रीराम मंदिर में चढ़ावा चोरी का मामला इस समय काफी गर्म है. आज एसआईटी की जांच भी पूरी हो गई. उम्मीद है कि जल्द ही इस पूरे मामले का खुलासा हो जाएगा. इस बीच हर कोई जानना चाहता है कि आखिर ये चोरी हुई कैसे? साथ में लोग यह भी जानना चाहते हैं कि चढ़ावे में आने वाली राशि और गहनों का मैनेजमेंट कैसे होता है? टीवी9 यूपी ने आज इसी मैनेजमेंट को समझने और आपको बताने की कोशिश की है.

बता दें कि राम मंदिर में रोजाना लाखों की तादात में श्रद्धालु पहुंचते हैं. ये श्रद्धालु मंदिर में अपनी क्षमता के मुताबिक दान भी करते हैं. कुछ लोग दान की रकम समिति को देते हैं तो कुछ दान पात्र में डालते हैं. यह चढ़ावा एक तय प्रक्रिया के तहत दानपात्रों से निकलकर ट्रस्ट के बैंक खाते तक पहुंचता है. इस पूरी व्यवस्था को पारदर्शी और सुरक्षित बनाने के लिए कई स्तरों पर निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था की गई है.

ये है व्यवस्था

रामलला के लिए दर्शन करने के लिए श्रद्धालु कतार में जाते हैं. हर कतार के निकास बिंदु पर दानपात्र रखे गए हैं, जहां श्रद्धालु नकद राशि, सिक्के, सोना, चांदी और आभूषण उसमें डाल देते हैं. पूरे मंदिर परिसर में करीब 40 दानपात्र स्थापित हैं. सामान्य दिनों में मंदिर को प्रतिदिन 8 से 13 लाख रुपये का चढ़ावा प्राप्त होता है. वहीं त्योहारों, विशेष आयोजनों और भीड़भाड़ वाले दिनों में यह राशि बढ़कर 50 से 60 लाख रुपये तक पहुंच जाती है.

दानपात्र खोलने का भी है नियम

मंदिर में रखे दानपात्र केवल भर जाने पर ही खोले जाते हैं. इसके लिए भी एक प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया के दौरान कम से कम चार अधिकृत व्यक्तियों की मौजूदगी अनिवार्य होती है. इनमें मंदिर ट्रस्ट के प्रतिनिधि, भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के प्रतिनिधि, गणना प्रक्रिया से जुड़े सहयोगी कर्मचारी, तकनीकी और संचालन सहायता से जुड़े कर्मी शामिल हैं. इस व्यवस्था का उद्देश्य दानपात्र खुलने के शुरुआती चरण में ही बहुस्तरीय सत्यापन सुनिश्चित करना है.

फिर शुरू होता है अगला चरण

दानपात्रों से पूरी राशि निकालने के बाद इसे लोहे के सुरक्षित कंटेनरों में रखा जाता है और फिर विशेष ट्रॉलियों पर लादकर इसे लगभग 200 मीटर दूर स्थित यात्री सुविधा केंद्र ले जाया जाता है. यह पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी की निगरानी में होती है. मंदिर के सभी 40 दानपात्रों से एकत्र चढ़ावा इसी केंद्र के बेसमेंट में स्थित केंद्रीय गणना कक्ष में पहुंचाया जाता है. फिर दान राशि की गणना प्रतिदिन दो शिफ्टों में की जाती है. इसमें पहली शिफ्ट सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक होती है. इसी प्रकार दूसरी शिफ्ट दोपहर 2 बजे से रात 8 बजे तक की है.

20 कर्मचारी करते हैं गिनती

प्रत्येक शिफ्ट में लगभग 20 गणनाकर्मी होते हैं. इन कर्मचारियों के लिए भी सख्त नियम हैं. इसमें पहला नियम है कि वह जेब वाले कपड़े नहीं पहनेंगे. शिफ्ट के दौरान आवाजाही सीमित रहेगी, उन्हें केवल निर्धारित और नियंत्रित अवकाश की अनुमति होगी. इस पूरी व्यवस्था पर निगरानी की जिम्मेदारी ट्रस्ट के सदस्य अनिल मिश्रा की होती है. संचालन स्तर पर एसबीआई और तकनीकी सहयोगी कर्मी व्यवस्था संभालते हैं.

ऐसे होती है गिनती

दान में प्राप्त सामग्री को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है. जैसे कि करेंसी नोट, सिक्के, सोना-चांदी और अन्य बहुमूल्य वस्तुएं. इन सभी को निर्धारित काउंटरों पर रखकर गिना जाता है. गणना पूरी होने के बाद नकदी को बैंक के विशेष कंटेनरों में सीलबंद किया जाता है और बख्तरबंद गाड़ी से इसे भारतीय स्टेट बैंक की शाखा में भेज दिया जाता है. जहां बैंक द्वारा दोबारा सत्यापन के बाद यह राशि ट्रस्ट के खाते में जमा कर दी जाती है.

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